सामाजिक न्याय की स्थापना और शोषण के विरुध शिक्षा ही एकमात्र अस्त्र

बिलासपुर : सामाजिक न्याय की स्थापना और शोषण के विरुध शिक्षा ही एकमात्र अस्त्र है। भारत के संविधान की धारा 46 में यह स्पष्ट किया गया है कि राज्य विषेश सावधानी से समाज के गरीब वर्गो को विशेषकर अनुसुचित जाति तथा अनुसुचित जनजाति के शैक्षणिक और आर्थिक हितों का सम्वर्धन करेगा तथा सभी प्रकार के शोषण से संरक्षित करेगा।

लेकिन भारत के हर नागरिक को मिले शिक्षा के मूल अधिकार पर यदि विश्वविद्यालयीन उच्च शिक्षा व्यवस्था ही धुंधलका फैलाए तो सवाल उठाना जरुरी है। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के तथाकथित अपग्रेडेशन यानि की केन्द्रीय विश्वविद्यालय में बदलने के बाद अस्तित्व में आए बी.यु. को ही लिया जाए तो उल्लेखनीय है कि पिछले सप्ताह अंतविरोधग्रस्त निर्णय लेकर बी.यु. प्रशासन ने छात्रहीत को अनदेखा किया है जैसे –

पुर्व स्वीकृत पुर्नमुल्यांकन व्यवस्था को लाॅ के छात्रों के संदर्भ में समाप्त घोषित करना विकल्प स्पस्ट किए बगैर ।
वार्षिक परिक्षाओं के कारण सेमेस्टर का प्रभावित होना, प्रभावित विधि छात्र एक या डेढ एकेडेमिक वर्ष पीछे चल रहे है। छत्तीसगढ उच्च न्यायालय में पेटिसन भी लगा है।
जुलाई में बी.यु. ने डिटेल्य जारी किए 21000 हजार छात्र पुर्नमुल्यांकन के दायरे में और फिर नवम्बर दिसम्बर में खबर आई कि सभी 21000 छात्र पुर्नमुल्यांकन में उत्र्तीण हुए।

चरम एबसर्डिटी पर टिका यह तुगलक प्रबन्धन छात्र हितों का हनन है। इस क्षेत्र के सीमांत वंचित छात्र समुदाय को एक पारदर्शी व्यवस्था देना बी.यु. का दायित्व बनता है। आगामी दो और चार अप्रेल तक सेमेस्टर परिक्षाएं घोषित हो जाने के बावजूद 28 मार्च 2018 को देर शाम तक पुर्नमुल्याकन के परिणाम नही आए थे। ए.टी.क.ेटी. सिस्टम में कितने प्रश्नपत्रों को फेल होने पर केरी किया जा सकता है यह भी स्पष्ट नही था।

कुलपति डॉ.जी.डी.शर्मा से मोबाईल पर वस्तुस्तिथि की जानकारी देने पर देर शाम इन्टरनेट पर पुर्नमुल्यांकन के परिणाम डिस्प्ले हुए । ए.टी.क.ेटी.पर तब भी स्थिति भ्रामक है। निर्धारित प्रश्न पत्रों में अनुत्र्तीण प्रश्न पत्रों का 50 प्रतिशत केरी किया जा सकता है। यु.जी.सी के आॅर्डिनेन्स के अनुसार छत्तीसगढ उच्च न्यायालय ने इस आॅर्डिनेन्स के अनुसार प्रक्रिया अपनाने के निर्देष विश्वविद्यालय को दिए है।

लेकिन सम्बद्ध लाॅ कॉलेज इन निर्देशों के लिखित या डेट पर जारी प्रारुपों की अपेक्षा करते है। विषय पर अधिकार रखते छात्रों की पुनः पुर्नमुल्यांकन की सम्भावना भी खत्म हो गई। प्रायः प्रश्नपत्र लीक होना 30000 प्रश्न पत्रों का खारीज होकर पुनः प्रकाशन एक प्रश्नपत्र का प्रकाशन सिर्फ अंग्रजी में होना यह एक बिमार परिक्षा प्रबन्धन है। बी.यु. का इसलिए लगातार मानसिक दबाव में रहने वाला छात्र समुदाय जब आंदोलित होता है तो एस.एस.पी.पर विगत जुलाई में ही पेट्रोल तक उडेलने की खबर छपती है।

छत्तीसगढ संवेदनशील जैसे जाति-जनजाति बहुल संवेदनशील क्षेत्र में शिक्षा का रेनेन्सा क्या बी.यु. ऐसे ही बाँटेंगा ?इन्टरनेट दर्शाता है कि शिक्षा में केेरल के बाद छत्तीसगढ दुसरे क्रम पर है। लेकिन हालात बयां करते हैं कि उच्च शिक्षा की हमारी प्रथमिकता और मानदण्ड दोनो सुनिश्चित किए जाना अभी बाकि है।

बेशुमार गलतियों पर विराजित बी.यू. पर संसाधनों के दुरुपयोग को लेकर एक श्वेत पत्र जारी होने की स्थिति बनती है। इन्र्फास्ट्रक्चरल विकास से प्रगति नही होती, नए विषय , समूह, सामाजिक विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के एडवांसमेंट से जुडा कोई बडा प्लान बी.यू. के पास नही है।

इनसेल्फ क्रिएटेड सीमाओं को लेकर 28 मार्च को जब मैने मोबाईल से कुलपति डॉ शर्मा से बिन्दुवार बात की तो सच्चाईयों को साईड ट्रेक करते हुए वे थोडे डिफेन्सिव थे लेकिन हमारे हस्तक्षेप के बाद जब देर शाम पुर्नमुल्यांकन के नतीजे नेट पर जारी हुए, ऑफ लाईन फार्म भरने की सुविधा प्रभावित छात्रों को दे दी गई, तो वि.सी. ने आफेंसिव होकर कहा मीडिया का क्या? यह तो हर दिन हमारे पास आया करता है।

इसलिए यहां इतना स्पष्ट करना जरुरी है कि कुलपति महोदय यह बिलासपुर का मीडिया ही है जिसने फेक्चुअल होकर विश्वविद्यालय की गिरावट को आईना दिखाया है। प्रजातंत्र के इस चैथे स्तम्भ को केचुअली लेना गलत है इसके साथ किसी भी संस्था प्रमुख का रुख ठीक वैसा ही रहना चाहिए जैसा एक राजा का दूसरे राजा के साथ होता है। फिर भी हमारी कोशिश रहेगी कि आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में उच्च शिक्षा की स्थिति का विश्लेषण जारी रहे।

डाॅ.कल्याणी मानसिंह महापात्र वर्मा
उपाध्यक्षक -‘‘अन्वीक्षा’’ (आदिवासी शिक्षा और स्वास्थ्य पर केन्द्रीत एक उपक्रम)
सम्बद्धता: योजना आयोग, भारत शासन, नई दिल्ली

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