प्रस्तावना संविधान का मुखड़ा ही नहीं उसकी आत्मा : डॉ चंद्रकुमार

<h2>प्रस्तावना संविधान का मुखड़ा ही नहीं उसकी आत्मा : डॉ चंद्रकुमार</h2>

<p>राजनांदगांव । प्रस्तावना संविधान का मुखड़ा ही नहीं उसकी आत्मा है । ये बातें शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय के प्राध्यापक डा. चन्द्रकुमार जैन ने अपने सम्बोधन में कही । डॉ. जैन ने बहुत सरल शब्दों में संविधान की प्रस्तावना के आदर्श, उद्देश्य और प्रभाव की जानकारी दी।</p>

<p>एक-एक शब्द को एक-एक पल पूरी जिज्ञासा के साथ मंत्रमुग्ध होकर सुनने के बाद विद्यार्थियों ने एकमतेन स्वीकार किया कि उन्हें अपने संविधान और राष्ट्र पर गर्व करने नया फलसफा मिल गया।
राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. अंजना ठाकुर ने आमंत्रित वक्ता डॉ.चन्द्रकुमार जैन की उपलब्धियों का आत्मीय शब्दों में परिचय दिया।</p>

<p>व्याख्यान के शुरू में डॉ. चन्द्रकुमार जैन ने प्रस्तावना के हरेक शब्द का अर्थ बताते हुए उत्सुक विद्यार्थियों को उसका मर्म भी समझाया। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय उपलब्ध कराना। विचार, मत, विश्वास, धर्म तथा उपासना की स्वतंत्रता प्रदान करना।</p>

<p>पद और अवसर की समानता देना। व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता स्थापित करना ही संविधान का उद्देश्य है। डॉ. जैन ने स्पष्ट किया कि इसमें लोगों को सबसे ऊपर रखा गया है। यह लोकतंत्र की प्राण प्रतिष्ठा का सहज प्रमाण है।</p>

<p>इतिहास में पहली बार भारत के लोगों को अपना भाग्य आप लिखने का सौभाग्य और अधिकार मिला। संविधान में आम आदमी की आवाज को वाजिब जगह मिली। व्यक्ति की गरिमा को पहला स्थान दिया गया।</p>

<p>प्रसंगवश डॉ. जैन ने विद्यार्थियों की जानकारी के मद्देनजर संविधान की प्रस्तावना में अमेरिका, रूस और फ्रांस आदि देशों से ग्रहण की गई प्रेरणा का खुलासा भी किया। साथ ही उसके प्राधिकार की चर्चा भी की। प्रस्तावना के महत्व के साथ उसकी सीमाओं को भी सरल शब्दों में समझाया।</p>

<p>उन्होंने कहा कि हमारे संविधान में किसी भी तरह के भेदभाव को अवैधानिक करार दिया गया है। भारत के लोग संविधान के मूल स्रोत हैं और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करना इसका परम ध्येय है।</>

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