युवाओं के कंधों पर है सुंदर और आदर्श दुनिया बनाने की जिम्मेदारी

भोपाल के विभिन्न शिक्षा संस्थानों में आयोजित यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव-2018 प्री-टॉक में वक्ताओं और युवाओं ने व्यक्त किए विचार

भोपाल : लंबे समय की पराधीनता के कारण हमारा मानस ऐसा बन गया है कि आज भी हमारी नजर बाहर लगी हुई है। हम अपनी ज्ञान-परंपरा को देख ही नहीं पा रहे हैं। दूसरे लोग जब हमें बताते हैं कि हम महान ज्ञान-परंपरा के वाहक हैं, तब हमें थोड़ा अहसास होता है। आज आकांक्षावान भारत स्वर्णिम भविष्य के सपने देख रहा है। सवा करोड़ भारतवासियों के सपनों को पूरा करन, दुनिया को अधिक बेहतर, सुंदर और आदर्श बनाने की जिम्मेदारी युवाओं के कंधों पर है। यह विचार माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. संजय द्विवेदी ने यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव के प्री-टॉक में व्यक्त किए।

प्रो. द्विवेदी ने मैनिट में आयोजित प्री-टॉक में युवा विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज हमारी स्थिति यह है कि हम अपने उत्पादन को कमतर मानते हैं और बाहर की कंपनियों के स्टीकर लगी वस्तुओं के प्रति हमारा भरोसा अधिक है। युवाओं को मानसिकदासिता से बाहर निकलने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत में जन्म लेने वाला बच्चा अधिक भाग्यवान है। उसे बड़े समाज की सेवा करने का अवसर प्राप्त होता है। अपने से कमजोर लोगों के लिए जीना सबसे बड़ी देशभक्ति है। श्री द्विवेदी ने बताया कि हम जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, सामर्थ्यवान होते जाते हैं, अपनी जड़ों से दूर हो जाते हैं। शहर में आने से सबसे पहले गाँव छूट जाता है। पढ़-लिख कर कुछ बन गए तो नाते-रिश्तेदार और परिवार छूट जाते हैं। उन्होंने कहा कि हमें सामर्थ्यवान तो होना है, लेकिन अपनी जड़ों को नहीं छोडऩा है।

झोंपड़ी में डाका नहीं पड़ता : भारत की समृद्ध विरासत को बताते हुए प्रो. द्विवेदी ने कहा कि भारत सोने की चिडिय़ा था। इसलिए यहाँ दुनिया भर से लुटेरे आए। एक ही मंदिर सोमनाथ को सात बार लूटा गया। हम पर बार-बार हमले हुए, इसका एक ही अर्थ है कि हम समृद्ध थे। झोंपड़ी को लूटने के लिए कोई नहीं आता। उन्होंने बताया कि हमें अतीत को कोसने से कोई लाभ नहीं होगा। अपने इतिहास से सबक लेकर देश के लिए कुछ करने का समय है।

दुनिया में बौद्धिक संघर्ष चल रहा है : प्रो. द्विवेदी ने बताया कि अब विस्तारवादी ताकतों ने अपनी रणनीति बदल ली है। अब सैन्य हमले नहीं हो रहे, बल्कि वैचारिक लड़ाई चल रही है। अमेरिका-चीन दूसरे देशों को अपने जैसा बनाने के लिए उन पर आक्रमण नहीं करते। भारत में ही कई लोग ऐसे हैं, जो भारत को अमेरिका और चीन के जैसा बना देना चाहते हैं। ऐसे लोग अमेरिका-चीन के प्रभाव में वैसी ही बोली बोलते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता मैनिट के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष एसपीएस राजपूत ने की और संचालन सहायक प्राध्यापक डॉ. मनोज आर्य ने किया। इस अवसर पर यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव की जानकारी सुधांशु ने दी।

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