संस्कार परिवर्तन की क्रांति को ही सक्रांति कहते हैं

दीपक वर्मा

अभनपुर,(रायपुर)।

छत्तीसगढ़ विश्व में अनेक क्रांतियां हुई हरित क्रांति, स्वेत क्रांति लेकिन उसे से संसार सुखि नहीं बन पाया। क्योंकि जब तक जीवन में शांति की क्रांति नहीं आएगी तब तक सक्रांति अर्थात जीवन में अच्छी बातों की क्रांति कैसे आएगी।

हम भले ही हर वर्ष मकर सक्रांति मनाते रहे जब तक जीवन में आध्यात्मिकता नहीं आएगी तब तक जीवन सुख शांति से खाली रहेगा। यह वाक्य इंदौर से पधारे वरिष्ठ राजयोगी ब्रह्माकुमार नारायण भाई ने मकर सक्रांति पर ब्रह्माकुमारीज़ नवापारा नगर द्वारा ओम शांति कॉलोनी में आयोजित महिलाओं के लिए हल्दी कुमकुम की सोंधी महक कार्यक्रम में संस्कार परिवर्तन में महिलाओं की भूमिका विषय पर बताया कि जब जीवन में आध्यात्मिकता आ जाती है तब बुराइयों का अन्त हो जाता है।

जीवन गुड़ के समान मीठा बन जाता है ।तिल अर्थात छोटी छोटी बुराइयों के त्याग से आत्मा के आत्मा के साथ मीठा व्यवहार हो जाता है ।प्रेम प्यार सुख का जीवन बन जाता है ।ऐसे आध्यात्मिकता द्वारा संस्कार परिवर्तन की क्रांति को ही सक्रांति कहते हैं ।

इसी का यादगार भक्ति मार्ग में चलता है ।कार्यक्रम की मुख्य अतिथि हरिहर उच्च माध्यमिक विद्यालय की प्राचार्य ललिता अग्रवाल ने बताया कि मकर सक्रांति का पर्व संक्रमण काल का होता है , जीवन में व्याप्त नकारात्मकता को विदाई व सकारात्मक अच्छाइयों को धारण करने का दिन होता है ।मा ही बच्चे का आदर्श गुरु होती है ।

अच्छे बुरे की तरफ ले जाने वाली मां के पास ही बच्चा गर्भ से बाल अवस्था तक साथ में रहता है ।मां का भाव, स्वभाव ,व्यवहार ,सोच का गहरा प्रभाव बच्चे की मानसिकता पर पड़ता है। मा ही बच्चों की प्रथम गुरु कहलाती है ।विशिष्ट अतिथि में सानवी अबेकस के मालिक निधि अग्रवाल ने बताया कि जैसे दाल, चावल खिचड़ी में एक रस मिल जाते हैं उसी प्रकार हमें सब के साथ संस्कारों का मेल मिलाप करना है ।

तिल के समान सभी आत्माओं के साथ एकजुट होकर रहना है ।गुड खाने खिलाने का भाव यह है कि सब के साथ वैर विरोध और बीती हुई कड़वी बातों को भुलाकर संबंधों को मधुर बनाना ही मीठा बोलना है। विशिष्ट अतिथि में अध्यक्ष, महावीर इंटरनेशनल के अंजू पारख ने कहा कि जीवन को लड्डू के समान मीठा बनाने की प्रतिज्ञा करनी होती है।

आज हम हर बात के लिए औरो को दोषी बनाते हैं जिससे जीवन में कड़वाहट आती जा रही है। उस बात के लिए स्वयं को दोषी बनाए तो सामने वाला स्वत ही हमारे से प्रेम करने लगेगा ।कार्यक्रम की अध्यक्षता ब्रह्माकुमारी सेवा केंद्र की संचालिका ब्रम्हाकुमारी पुष्पा बहन ने बताया कि हमारी संस्कृति में हर शुभ कार्य का साक्षीअग्नि को माना जाता है।

अग्नि यज्ञ का रूप है ,मुक्ति का साधन भी ,जीवन की सारी बुराइयों व शरीर को अग्नि में समर्पित करना अर्थात कंचन काया प्राप्त करना। ऐसी अवधारणा से सक्रांति पर्व पर तिल ,जो अग्नि को समर्पित किया जाता है।जिससे जीवन मीठा बन जाता है ।

जीवन प्रेम शांति आनंद से भरपूर बन जाता है ।कार्यक्रम के अंत में शांति अनुभूति के लिए राजयोग का अभ्यास कराया गया। सभी को अविनाशी सुहाग व स्वास्थ्य का प्रतीक हल्दी कुमकुम का टीका दिया गया। तिल के लड्डू से मुंह मीठा कराया गया ।कार्यक्रम में चित्र रेखा अग्रवाल ,रूपाली व अन्य समाज सेवी महिलाओं भी उपस्थिति थी।।

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