‘राही’ के व्यंग्य बाण : बहुमत की खोज

राजेश जैन राही

बहुमत का बड़ा महत्व है खासकर लोकतंत्र में। संख्या बल की कीमत है गुणवत्ता बल की नहीं, सौ लोगो की भीड़ में इकावन जो कहेगें वो सही माना जायेगा भले ही उनचास ही सही क्यों न हो ? गनीमत है बहुमत का यह कानून घरों में लागू नहीं है वरना बात-बात पर रोजाना वोटिंग ही होती रहती।

मगर लोकतंत्र में सरकारें तो बहुमत से ही चलती हैं। कैकई ने भरत के लिए वरदान मांग लिया था अब वरदान की परम्परा नहीं रही, अब तो बहुमत चाहिए। बहुमत जुटाने के लिए सोलह कलाओं का ज्ञान होना जरूरी है। जिस प्रकार पहले राजा महाराजा अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण होते थे वैसे ही आजकल बहुमत जुटाने की कला में निपुण होना जरूरी है। मंत्री पद का प्रलोभन, पुराने मुकदमों की वापसी, आर्थिक लाभ कुछ प्रमुख अस्त्र हैं जो बहुमत जुटाने में काम आते हैं मगर इनका संचालन निपुणता से करना होता हैं थोड़ी भी असावधानी आपके मंसूबों पर पानी फेर सकती है।

त्रिशंकु विधानसभा हो तो इन कलाओं का महत्व काफी बढ़ जाता है। अंतर्मन की आवाज पर वोट दिये जाने का दावा विधायक करते आये हैं अब इन दावों पर देश में किसी को यकीन नहीं रहा। राजनीति सम्भावनाओं का खेल है और आजकल खेलों में भी फिक्सिंग खूब हो रही है फिर भला राजनीति में क्योें न हो ?

देश सेवा का नारा लगाने की छूट सबसे अधिक राजनीतिज्ञों को मिली हुई है। कोई व्यापारी, किसान, मजदूर, नौकरी पेशा कभी नही कहता – वर्षो से देश सेवा में लगा हुआ हूँ। प्रायः नेतागण ही रोज इसी उद्घोषणा के साथ दिन की शुरूआत करते हैं। नब्बे विधायकांे की संख्या वाली विधानसभा में चालीस विधायकों वाला दल बहुमत साबित नही कर पाता और पांच विधायकों का नेता मुख्यमंत्री बन भ्रष्टाचार के कीर्तिमान स्थापित करता हुआ राज करता रहता है। एकता में बल है, सत्यता में नहीं। भ्रष्ट लोगों को भी एक साथ रहने का अधिकार है। खरीद-फरोख्त कहाँ नहीं होती थोड़ी बहुत राजनीति मे हो गई वो भी स्थिर सरकार के लिए तो क्या हर्ज है ? लोगो का भला करना है सरकार बनाकर, चाहे जैसे भी बने।

आजकल विधानसभा की सीढियों पर मत्था टेकने की परम्परा है और अंदर जाकर सब करने की छूट। एक समय मां जानकी का अपहरण हो गया था अब विधायकों का अपहरण हो रहा है, कोई हनुमान दिखता नहीं जो विधायकों को बचा सके। हमारी शुभकामना विधायकों के साथ है बस निवेदन है – बिकना मत!

एक वोट से केन्द्र की सरकार गिर गई थी कुछ नैतिकता बची थी उस दौर में, पुनः चुनाव हुए तो उस दल को पुर्ण बहुमत मिला। जनता सब देखती रहती है। बहुमत की खोज में नैतिकता गँवाने का जोखिम जिसने भी लिया उसका हश्र सर्वविदित है। अतः हे जन प्रतिनिधि अपना ध्यान रखिये, देश की नजर आपके ऊपर है। जनता भोली है मगर उतनी भी नहीं जितना आप समझते हैं।
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