योग वैदिक ऋषियों की खोज

प्राणायाम की तकनीक के रूप में योग आमजन के बीच लोकप्रिय हैं

योग वैदिक ऋषियों की एक अनुपम खोज रही हैं। जिसे महर्षि पतंजलि ने क्रमबध्द स्वरूप दिया आज आशन। लेकिन ईश्वर की विराट सत्ता से जोड़ने व अपने वास्तविक स्वरूप से परिचय कराने वाले योग की गहराई तो वास्तव में ध्यान से शुरू होती हैं।

योग आध्यात्म और संस्कृति भारत की पुरातन विरासत हैं सनातन पहचान हैं। शाश्वत पहचान हैं कि जिसके बल पर भारत अपने स्वर्णिम युग के साथ विश्व को अजस्त्र अनुदान दे चुका हैं। इसके प्रवाह में क्षय के साथ देष अश्वासन और पतन का दौर भी देख चुका हैं।

और गुलामी का अभिशाप झेल चुका हैं। अपनी मूल विरासत के बल पर पुनर्जागरण से लेकर राजनैतिक स्वतंत्रता की सुबह उसने देखी है। 21 वीं सदी में उज्जवल भविष्य की सुनहरी आश के साथ प्रवेश कर चुका हैं।

भारत ही नहीं आतंक अशांति और विनाश के सायें में जी रहे पुरे विश्व के लिए इसमें शांति सद्भाव और समाधान की सम्भावनाएं भरी हुई हैं। योग वैदिक ऋर्षियों की एक अनुपम खोज रही हैं। जिसे महर्षि पतंजलि ने क्रमबध्द स्वरूप दिया।

आज आशन प्राणायाम की तकनीक के रूप में योग आमजन के बीच लोकप्रिय हैं। लेकिन ईश्वर की विराट सत्ता से जोड़ने व अपने वास्तविक स्वरूप से परिचय कराने वाले योग की गहराई तो वास्तव में ध्यान से शुरू होती हैं।

यह नियम के रूप में योग का प्राथमिक आधार एक अनुशासित जीवन शैली एक समग्र जीवन दर्शन के रूप में प्रदर्शित होता हैं। इसे कई रूपों में ऋर्षि महर्षि परिभाषित करते आए हैं।

व्यापक शब्दों में विराट से जोड़ने वाली विधा के रूप में योग कर्मयोग,ज्ञानयोग,भक्तियोग,प्राणयोग,मंत्रयोग,तंत्रयोग,राजयोग आदि कितने ही नामों कें साथ रूपाकार लेता हैं। इस तरह योग भारतीय संस्कृति में जहां एक ओर एक दर्शन रहा हैं।

जो कि सांख्य का पुरक माना जाता वही व्यापक अर्थों में अनुशासन में बध्द एक जीवन शैली जीने की पध्दति हैं। आध्यात्म भारतीय संस्कृति का सार रहा हैं। योग भी अपने चरम पर आध्यात्म की ओर प्रवाहित होता हैं।

वास्तव में अध्यात्म वह तत्व हैं। जो धर्म से जुड़ा रहा है। हर धर्म के मूल में अपनें दिव्य स्वरूप से परिचय कराने वाला जो अनुभुति प्रधान चैतन्य तत्व हैं वही आध्यात्म है। इस तरह से आध्यात्मिक स्तर पर हर धर्म एक ही स्थिति को दर्शातें हैं।

स्वस्थ मन स्वस्थ शरीर काया का परिचय है। विचार भाव क्रिया समन्वय है। योग का अर्थ जिससे की हम जीवन में उत्कृष्ट कार्य कर सकें। आज के व्यक्तित्व एवं पारिवारिक तनाव में स्थित इसका महत्व बढ़ जाता है।

प्रैक्टिकल के रूप में आशन प्राणायाम का अपना महत्व बढ़ जाता हैं। किन्तु इसका आध्यात्मिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण हैं। योग से चित का शुध्दिकरण संस्करण होता है। जिससें स्वयं का नया रूपांतरण होता है।

खानपान रहन-सहन नित्य कला व धर्म के आदि के माध्यम से यह सब अविवत होता हैं। प्रायः योग और संस्कृति अपनें अतिवाह में यह उझलें स्वरूप में मनुष्य अपनें मूल गन्तव्य तक नही पहुँच पाते।

आध्यात्मिक इस कमी को पूरा करता हैं आध्यात्म सम्यक दृष्टि देता हैं। जीवन में एक समग्रस्ता का बोध देता हैं। प्रोफेशनल या फिर व्यक्तित्व जीवन में अपने जीवन को सार्थक ढंग दे सकते हैं। राष्ट्रीय योग दिवस आज अपनें विचार धर्म एवं संस्कृति को समपर्ण हैं।

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