देह अभिमान से हुआ पाप, गौ हत्या से भी बड़ा : स्वामी परमानंद

देह अभिमान से हुआ पाप, गौ हत्या से भी बड़ा : स्वामी परमानंद

रायपुर । सोच का थोड़ा सा फर्क बहुत बड़ा फासला बन जाता है। इसलिए हम सोच को बदलें। आप कौन हैं? जागृत, स्वप्न और सुशुप्ति इन सबका का अंत जो देखता है वही अनंत है। आपने अपना अनंत देखा कहां हैं, इसलिए जिसका अंत देखते हैं उसे ही अपना अंत मान लेते हैं। स्वप्न में हम अपना अंत देख सकते हैं, जागते में नहीं। श्रीमद्भागवत कथा मनुष्य को जगाने के लिए आवश्यक है।

स्वामी परमानंद गिरि (हरिद्वार) ने अखंड परमधाम सेवा समिति की ओर से आशीर्वाद भवन के श्रीमद्भागवत कथा में बुधवार को मनुष्य के जीवन को जोड़कर काफी गंभीर बातें कही, देह के अभिमान से जो पाप होता है वह गौ हत्या से भी बड़ा पाप होता है। पाप मंदिर जाने या तीर्थ जाने से दूर नहीं होता है पाप तो ब्रम्ह का खयाल मात्र आने से ही दूर हो जाता है। मन परिवर्तित होते रहता है। मुख से तो हम बोलते हैं लेकिन कानों से न जाने क्या-क्या सुनते हैं जो हमारे जीवन को ही खराब कर जाती है।

इसलिए कानों से सही बातें सुने और घर को मंदिर बनायें। इंद्रिया शत्रु भी है और मित्र भी, इसलिए इंद्रियों को नियंत्रित कर लिया तो कहां से कहां पहुंच जाओगे। सतोगुणी ऊपर हो जाते हैं। मैं कुछ हूं यही दुख है, दुख को समझने गीता पढ़ें,जो भी सुख मिलता है वह आदिकाल का है। जैसे दुख और सुख का अंत होता है, वैसे जीवन का अंत होता है। पूरी भागवत 4 श्लोकों में है। सोये हुए संसार का बोध जागने में है।

भागवत सुनने के लिए सांसारिक होना जरूरी है। भागवत कथा कृष्ण ने भी सुनी और अर्जुन ने भी लेकिन वे सन्यासी नहीं थे। जिनके सामने समस्या हो उनको भागवत सुनना जरूरी है। जो सोया है वही जागेगा। जो जागेगा वही सोएगा, जो मरेगा वही पैदा होगा। जागृत का अंत ना चाहते हुए भी हो जाता है। ड्राइवर को नींद ना भी आये फिर भी जागने का अंत हो जाता है और उसको नींद आ जाती है। स्वप्न में हम अपना अंत देख सकते है। जागते में नही। श्रीमद् भागवत मनुष्य को जगाने के लिए आवश्यक है। राजा परिक्षित की कथा प्रसंगवश सुनाते हुए उन्होने बताया कि बचपन से जवानी आ गई है तब बचपन साथ छोड़ गया। जवानी साथ छोड़ गई तो बुढ़ापा आ गया। उम्र के साथ सतत चलने वाली यह प्रक्रिया है। नदी के किनारे को तट कहते है, जीव तटस्थ नही है। नदी का पानी बह जाता है और हम तट पर खड़े रह जाते हैं। ये जीवन तटस्थ नही है। आप दृष्टा बन कर सावधानी पूर्वक देखो क्या होता है। ध्यान में मन नही लगता लेकिन टीवी देखने को मन करता है। भजन में मन नही रहता। इसी देह व मन में रहते हुए आप ब्रम्ह हो सकते हैं यह मिलती है सही सोंच व अनुभूति से। विवेक के बिना साधना संभव नहीं है।

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