मां जेवरादाई की गाथा, श्रद्धालुओं की लगी रही भीड़

योगेश केशरवानी

देवसागर भटगांव। मां जेवरादाई का मंदिर छत्तीसगढ़ के बिलाईगढ़ के नगर पंचायत भटगांव से पूर्व दिशा में 3 किलोमीटर दूर पर वनांचल पहाड़ियों पर ग्राम देवसागर में विराज मान है। जिसका मूल स्थान ग्राम जेवराडिह है, जहां प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा में माँ जेवरादाई का विशाल मेला लगा था जिसे देखने के लिए पुरे भारत भर से एवं विदेशों से लाखों की संख्या में भक्तगण माँ जेवरादाई का दर्शन के लिए आज यहाँ पर आ कर भक्तजन अपने मनोरथ ,आशीर्वाद एवं मनोवांछित फल की प्राप्ति किये ,,माँ जेवरादाई जग जननी ,दूखहरती – शुखकरती एवं फलदायनी देवी है ,,यहाँ पर भक्तगण आकर अपने तमाम परेशानी रोग विकारो ,गरीबी एवं बांझपन से मुक्ति पाते है ,, जिन स्त्रियों को मातृत्व सुख की प्राप्ति नहीं होती है।

वो स्त्री अपनी आस्था व् श्रध्दा से माँ की चरण कमल का आशीर्वाद लेकर एवं बैगा की हल्दी की छींटा लेकर मातृत्व सुख का आनंद पाती है ,, दूर दूर से लोग माँ जेवरादाई के कर नाप कर अपनी मनोरथ की प्राप्ति करते है ,, वही मेले का आयोजन किया जाता है मेले में भक्तजनों का मनोरंजन के लिए झुला सर्कस ,जसगीत कार्यक्रम एवं खेल खिलोने इत्यादि सभी व्यवस्थित रहते है।

पौराणिक किदवंन्ति के अनुसार आज से लगभग सैकड़ों वर्ष पहले माँ जेवरादाई सुदूर वनांचल खुबसूरत वादी पहाड़ी क्षेत्र ग्राम जेवराडिह में विराजमान था जिनकी ख्याति एवं प्रसिध्धि चारों दिशाओं में फैला हुआ था। दूर-दूर से भक्तगण एवं राजा महाराजाओं का माँ जेवरादाई के दरबार में यज्ञ पूजन के लिए आना जाना हमेशा था,,भटगांव एवं सारंगढ़ के जमींदार जिनमे प्रमुख थे।फलदायानी माता के सत्यता से सभी परिचित थे।

भटगांव और सारंगढ़ के राजाओं की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी ,,इन्होने अपना राज्य माता के आशीर्वाद से कई कोसों तक फैला दिया था।

माँ जेवरादाई कोसम वृक्ष के निचे विराजमान थी  जहाँ भैरव बाबा व् अन्य देवी देवता विराजित थे ,, माँ जेवरादाई प्रभात बेला में बैगा के घर से होते हुए एवं ठाकुर देव से मिलते हुए स्नान के लिए जाती थी जिसका प्रमाण इस बात से मिलता है की एक सुबह मांझी बैगा सोकर नहीं उठे थे।

इसलिए माता ने नाराज होकर उसकी पीठ पर जोरदार कोड़े मारा ,, जिसका निशान बैगा के पीठ पर मरते दम तक था,,माँ जेवरादाई के इन सब बातों को सुनकर एवं ध्यान में रखकर सारंगढ़ के राजा ने अपने राज्य में माता को विराजमान करने को सोंचा और एक दिन माँ जेवरादाई के पास जाकर कहा की मै आपको ले जाकर अपने यहाँ सेवा करना चाहता हूँ। माँ जेवरादाई ने लाख मना किया लेकिन राजा के नहीं मानने पर उसने राजा के सामने अपनी शर्त रख दी और कहा की एक पग पर मुर्गी एवं एक पग पर बकरा और भोर होने से पूर्व मुझे ले जा सकोगे तभी मै तुम्हारे साथ जाउंगी अन्यथा वही रुक जाउंगी ,, सारंगढ़ के राजा ने माता के शर्त को स्वीकार कर लिया।

माता के शर्त के अनुसार सारंगढ़ के राजा माँ जेवरादाई को ले जा रहे थे तो माँ ने अपने क्षेत्र के भक्तगण की प्रेम को समझते हुए भटगांव के जमींदार को स्वप्न दिया की मुझे सारंगढ़ के राजा अपने साथ ले जा रहा है ,,तुरंत आकर मुझे वहां जाने से रोक लो

राजा ने तुरंत उठकर अपने सेना एवं दलबल सहित माँ जेवरादाई के तरफ चल दिए जहाँ सारंगढ़ के राजा ले जा रहे थे ,, वही भटगांव के राजा के बिच युध्ध हुआ और उद्ध करते करते भोर हो गई ,, तो माँ जेवरादाई ने सारंगढ़ के राजा को कहा की बेटा शर्त के अनुसार सुबह हो गई है अब मै यही विराजमान हो जाती हूँ ,,यही पर रहकर मै सभी पुरे राज्य की रक्षा करुँगी ,,तो सारंगढ़ के राजा ने ठीक है कहकर माता जेवरादाई की नांक को काटकर अपने यहाँ अन्डोला सारंगढ़ ले गया ,, और जहाँ माँ जेवरादाई विराजमान हुई वह स्थान आज देवसागर है और हिंगलाज माता के नाम से प्रसिध्द है।

यहाँ प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर मात्र एक दिन का  मेला लगता है एक दिन के  मेला लगने का प्रमुख कारण यह है की एक दिन मेला खत्म होने के बाद बैगा माता के स्थान पर पूजा पाठ करके घर चला गया।

घर पहुंचते ही बैगा को पता चला की वह अपना खड़ग को वही भूल गया है खड़ग को लाने के लिए वह पुनः वापस माता के स्थान पर चला जाता है ,, वहां पर पहुँचते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गया ,,वहां पर यह देखता है की माता की इक्कीस बहनियां साथ-साथ खेल रही है और माता के सेवकगण बाघ शेर कटे बकरों के खून का रसपान कर रहे थे,,माता को ज्ञात हुआ की बैगा वापस आ गया है उसने बैगा को बुलाकर कहा की आज के बाद यहाँ चैत्र पूर्णिमा के रात्रि को इस स्थान पर कोई नहीं रुकेगा ,, जाओ तुम्हे जीवनदान देता हूँ कहकर बैगा को अपना घर भेज दिया।

इसलिए इसी दिन से चैतराई मेले का शुरूवात हुई मेले का आयोजन प्रति वर्ष चैत्र पूर्णिमा के दिन से आज तक भटगांव जमीदार परिवार द्वारा किया जाता है। जमीदार परिवार के परिवार देवी की पूजा अर्चना छः पीढ़ी से करते आ रहे है। अंतिम जमीदार प्रेम भुवन प्रताप सिंह थे। उनकी वशंज प्रभादेवी, इंदिरा कुमारी द्वारा लगभग 50 वर्षो तक देवी की पूजा अर्चना की गई। माता हिंगलाज भटगांव जमीदार की कुलदेवी के रूप मे मानी जाती है।

प्रभादेवी के स्वर्गवास हो जाने के बाद उनकी छोटी बहन इंदिरा कुमारी ने पूजा अर्चना जारी रखा। इसके बाद उनके गोद पुत्र पुष्पेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा किया जा रहा है। भटगांव जमीदार का पहले शासन काल काल मे धरम सिंह, 2 बुध्देश्वर सिंह, 3 प्रेम भुवन सिंह, 4 रानी बिन्देश्वरी देवी, 5 प्रभा कुमारी, 6 इंदिरा कुमारी का गोद पुत्र पुष्पेन्द्र प्रताप सिंह वर्तमान मे है।

अतः उसी दिन से एक दिन का मेला चैत्र पूर्णिमा के पावन अवसर पर रखा जाता है और कुंवार नवरात्री एवं चैत्र नवरात्र में माता के इस पावन मंदिर में भव्य एवं विशाल ज्योति प्रज्वलित की जाती है जिसमे भक्तगण लाखो की संख्या में दीप प्रज्वलित कर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते है।

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