संसार में इंसान सिर्फ मै और मेरा के फेर में खोया रहता है : स्वामी परमानंद

संसार में इंसान सिर्फ मै और मेरा के फेर में खोया रहता है : स्वामी परमानंद

रायपुर । संसार में इंसान सिर्फ मै और मेरा के फेर में खोया रहता है और जब बुढ़ापा आता है। तब उसे परमात्मा की याद आती है। तब तक उसके हृदय में सांसारिक भाव इतने भर गए रहते हैं कि , ईश्वर के लिए कुछ बचता ही नहीं है। यह बाते स्वामी परमानंद गिरि (हरिद्वार) ने अखंड परमधाम सेवा समिति की ओर से आर्शिवाद भवन में श्रीमद्भागवत कथा में श्रद्धालुओं से कही । साथ ही उन्होने कहा की इसलिए उसे पाना है तो सुदामा जैसा निर्मल भाव वाला हृदय रखें। उसने संसार में किसी को भी अंधेरे में नहीं रखा, श्रीमद्भागवत कथा में बताया गया है कि विपरीत परिस्थितियों में भी परमात्मा को याद रखो। जीवन में सफलता का अहंकार कभी भी नहीं लाना।

उन्होने कहा कि श्रीमद्भागवत गीता आम लोगों के लिए एक संदेश है कि सत्य की राह पर चलते हुए, परमात्मा की उन सारी लीलाओं को समझो, जिनको हर अवतार में उन्होंने संदेशात्मक रूप से इस संसार के लिए किया और कहा है।

एक कलाकार की भांति उन्होने सब कुछ बताया है, किसी को अंधकार में नहीं रखा है। मै कुछ भी नहीं है सब कुछ करने वाला वही है। लेकिन इंसान सब कुछ अनुकूल रहने पर उसे भूल जाता है और जब परिस्थितियां विपरीत होती है तब परमात्मा की याद आती है। उनकी कृपा के बगैर आप सफल हो ही नहीं सकते। इसलिए जीवन में सफलता का अहंकार कभी नहीं लाना।

मंदिर जाते है परमात्मा का दर्शन करने लेकिन वे सब के हृदय में बसे हुए है, जिसे हम नहीं देख पाते हैं इसलिए कि हमारे पास निर्मल भाव वाला हृदय नहीं है। भाव हो तो सुदामा जैसा, आज भी श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता मिसाल के तौर पर क्यों पेश की जाती है? कोई भी कथा हो आत्मीयता व पूरे मनोयोग से सुने,लोग सुन ही नहीं पाते हैं यही तो विडंबना है जब बच्चे को पालने के लिए केयर टेकर रख रहे हैं तब उस बच्चे को कैसा संस्कार मिलेगा जिसने माता पिता का प्यार जाना ही नहीं। जीवन में अब केवल औपचारिकताएं बच गई हैं।

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