छत्तीसगढ़राज्य

जीवन में खुशियाँ बहुत हैं लेकिन हम उसका पासवर्ड भूल गए हैं

तनाव से बचने के लिए हर बात में खुशियाँ ढूँढने का प्रयास करें

रायपुर: इन्टरनेशनल माइण्ड व मेमोरी मैनेजमेन्ट ट्रेनर ब्रह्माकुमार शक्तिराज सिंह ने कहा कि हमारे जीवन में खुशियाँ बहुत हैं लेकिन हम उसका पासवर्ड भूल गए हैं। कई लोग खुशी को भविष्य में ढूँढते रहते हैं। जो कि ठीक नहीं है। भूतकाल सपना है, भविष्य काल कल्पना है किन्तु वर्तमान तो अपना है। इसलिए वर्तमान में हर छोटी सी छोटी चीज में खुशियाँ ढूँढने का प्रयास करें। खुशियों का रिमोट कन्ट्रोल अपने पास रखें।ब्रह्माकुमार शक्तिराज सिंह आज प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय द्वारा विधानसभा मार्ग पर स्थित शान्ति सरोवर में आयोजित खुशियों की चाबी (Password of Happiness) नामक कार्यक्रम में बोल रहे थे।

कार्यक्रम का उद्घाटन छत्तीसगढ़ राज्य के महालेखाकार राजीव कुमार और क्षेत्रीय निदेशिका ब्रह्माकुमारी कमला दीदी ने दीप प्रज्वलित करके किया। ब्रह्माकुमार श्क्तिराज ने आगे कहा कि पैसा हमको कम्फर्ट दे सकता है खुशी नहीं। खुशी के लिए हमारी सोच जिम्मेदार होती है। मन में उत्पन्न नकारात्मक विचार हमें बीमार बना रहे हैं।

ब्रह्माकुमार श्क्तिराज ने बतलाया कि अधिकांश बीमारियाँ मन से पैदा होती हैं। चिन्ता, तनाव, भय, दु:ख और अशान्ति के कारण बीमारियाँ बढ़ रही हैं। इसलिए खुश रहने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि मन को अपना दोस्त बना लो। जब हम तनाव में होते हैं तो इससे हमारी धमनियों में ब्लाकेज होना शुरू हो जाता है। कोलस्ट्रोल बढ़ता जाता है। इससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि निगेटिव एनर्जी को खत्म करने का अच्छा तरीका है कि हम मुस्कुराना सीखें।

मुस्कुराने से हम अस्सी प्रतिशत से अधिक बीमारियों से बच जाते हैं। इससे हमारे अन्दर की नकारात्मकता तो खत्म होती ही है साथ ही वायुमण्डल में सकारात्मक उर्जा का संचार होता है। एक बच्चा सारे दिन में तीन सौ से अधिक बार मुस्कुराता है। उसी प्रकार आप भी पद और पोजीशन भूलकर बच्चा बन जाइए तो तनावमुक्त हो जाएंगे। उन्होंने आगे कहा कि यदि खुश रहना है तो स्वयं को डस्टबिन न बनने दें। कोई आकर आपसे निन्दा ग्लानि, चुगली करता है तो हाथ जोड़कर उससे कहें कि मैं डस्टबिन नहीं हूँ। अपना कचरा कहीं और जाकर डालें। बीमारियों से बचना है तो स्वच्छ बनना पड़ेगा। हमारे देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है। लेकिन सिर्फ बाहरी स्वच्छता से काम नहीं चलेगा। आन्तरिक स्वच्छता भी जरूरी है। ब्रह्माकुमारी संस्थान मन को स्वच्छ बनाने का काम कर रही है।

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