ये किसान नहीं चाहते कर्जमाफी की भीख

मुंबई: महाराष्ट्र की सरकार जहां एक तरफ किसानों के कर्जमाफी की घोषणा कर 56 इंच सीना तान रही है, वहीं हजारों किसान ऐसे हैं, जो सरकार से कर्जमाफी की भीख नहीं चाहते।

वे कहते हैं कि सरकार खेती करने की नई तकनीकी मुहैया कराए, उनकी फसलों का उचित मूल्य दे और खेती करने के लिए पानी मुहैया कराए।

बस, उन्हें सरकार से कुछ और नहीं चाहिए। वे खेती कर देशभर की जनता को भोजन मुहैया कराने में पूरी तरह से सक्षम हैं। उनकी मांग है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की जाएं।

बदली तस्वीर

पुणे जिले के जुन्नर तालुका में एक किसान महासम्मेलन का आयोजन किया गया, जहां बड़ी संख्या में किसान अपनी महंगी-महंगी चमचमाती गाड़ियों से आए।

ये ऐसे किसान हैं, जिनके पास बहुत ज्यादा जमीन नहीं है, फिर भी खेती से ही लाखों रुपये कमाकर दूसरे किसानों के लिए एक मिसाल पेश कर रहे हैं।

किसान मेले में आने वाले कई ऐसे किसान थे, जो उच्च शिक्षा प्राप्त थे।

वे चाहते तो दूसरे छात्रों की तरह देश-विदेश में नौकरी-धंधा कर मोटी रकम कमा सकते थे, लेकिन इन्होंने खेती की ओर रुख किया। आज ये एक सफल किसान है।

इंजिनियरिंग छोड़ की खेती

पुणे जिले के जुन्नर तहसील रोखड़ी सेगांव के युवा किसान वैभव मुरादे ने सन 2010 में संगमनेर के अमृतवाहिनी कॉलेज से इंजिनियरिंग की।

वैभव ने 4 एकड़ जमीन में टमाटर, प्याज, अनार की खेती की। इससे उन्होंने 20-22 लाख रुपये कमाए। ओटूर गांव के किसान विकास ढोबले खेती में पानी के उपयोग पर बहुत ही बारीक नजर रखते हैं।

कोठड़े गांव के राहुल भोसले अपने खेत में 700-800 ग्राम का अनार पैदा करते हैं। ये किसान शान से कहते हैं कि उन्हें सरकारी भीख, रहम, सब्सिडी नहीं चाहिए। उन्हें बस अपनी फसलों का उचित मूल्य चाहिए।

नई तकनीक से मिली मदद

इन किसानों की उपज बढ़ाने में सरकार की कोई भूमिका नहीं रही, बल्कि निजी कंपनियों ने इनकी जरूर मदद की।

वे कहते है कि ‘जेबा’ जैसे उत्पाद का उन्होंने उपयोग किया, जिससे उनकी फसल में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

इससे उनकी आय भी बढ़ी। राहुल बनकर कहते हैं कि पहले वे खेती से 10-12 लाख रुपये तक कमाते थे, लेकिन नई तकनीकी का उपयोग करने के बाद उनकी आय 20 से 22 लाख रुपये हो गई है।

वैभव मुरादे, इंजिनियर किसान कहते हैं, ‘हमें सरकार से भीख नहीं चाहिए। हम मेहनतकश लोग हैं।

हमें रोज नई-नई आ रही तकनीक, साधन-सुविधाएं चाहिए। हमें हमारी फसलों का उचित मूल्य चाहिए।’

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