श्राद्ध में करें ये खास काम हमेशा रहेगे आरोग्य

तृतीया तिथि का श्राद्ध उन पूर्वजों के निमित

गुरुवार 27 को अश्विन शुक्ल तृतीया पर तीज का श्राद्ध मनाया जाएगा। शास्त्र याज्ञ-वल्क्य-स्मृति के अनुसार मनुष्य के तीन पूर्वज हैं पिता, पितामह व प्रपितामह, अतः पितृ साक्षात वसु, रुद्र व आदित्य रूप में श्राद्ध देवता हैं।

मान्यतानुसार वसु, रुद्र व आदित्य श्राद्धकर्ता में प्रवेश करके व रीति-रिवाज के अनुसार करवाए गए श्राद्ध से तृप्त होकर वंशधर को सुख-समृद्धि का वरदान देते हैं।

तृतीया तिथि का श्राद्ध उन पूर्वजों के निमित किया जाता है जिनकी मृत्यु शुक्ल या कृष्ण पक्ष की तीज पर हुई हो। तृतीया तिथि की स्वामिनी देवी गौरी हैं।

तृतीया के श्राद्धकर्म में तीन ब्राह्मणों को भोजन करवाने का मत है। जिसमें सुहागन ब्राह्मणी सहित उसका पति व उनके पुत्र होने का मत है।

इस श्राद्ध में पुत्री व दामाद को पीले फल व कपड़े भेंट देते हैं। इस श्राद्ध में भगवान विष्णु के परशुराम अवतार का पूजन कर भागवत गीता के तीसरे अध्याय का पाठ किया जाता है।

तृतीया के श्राद्धकर्म, पिंडदान व तर्पण से आरोग्य की प्राप्ति होती है। धन वृद्धि होती है व जीवन में समृद्धि आती है।

तृतीया श्राद्ध विधि:

घर की दक्षिण दिशा में दक्षिणमुखी होकर सफ़ेद कपड़ा बिछाकर पितृ यंत्र व पितृओं के चित्र स्थापित करें।

जनेऊ (यज्ञोपवित) दाहिने कंधे से लेकर बाई तरफ करें। पीतल के दीपक में गौघृत का दीप करें।

सुगंधित धूप जलाएं, चंदन अर्पित करें, पीले फूल चढ़ाएं, मिश्री व इलायची चढ़ाएं तथा भोजन में बेसन का हलवा, पूड़ी व कुष्मांड सब्जी का भोग लगाएं।

इसके बाद विष्णु के परशुराम अवतार का स्मरण करते हुए तुलसी पत्र चढ़ाएं व भागवत गीता के तीसरे अध्याय का पाठ करें।

पितृ के निमित्त इस मंत्र का जाप करें। इसके बाद श्राद्ध में चढ़े भोग में से पहले गाय फिर काले कुत्ते व कौए के लिए ग्रास अलग से निकालकर उन्हें खिलाएं।

इसके बाद ब्राह्मण को भोजन करवाकर यथायोग्य दक्षिणा दें।

स्पेशल मंत्र: ॐ ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्॥

तृतीया श्राद्ध मुहूर्त

सर्वोत्तम कुतुप मुहूर्त: दिन 11:48 से दिन 12:35 तक।

श्रेष्ठ रौहिण मुहूर्त: दिन 12:35 से दिन 13:23 तक।

साध्य अपराह्न मुहूर्त: दिन 13:23 से शाम 15:45 तक।

Back to top button