उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में बाघ ले रहे हैं खूनी बदला

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में बाघ ले रहे हैं खूनी बदला

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में बाघों के हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं. यहां बाघ के हमलों में अब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी है, जोकि देश के किसी भी नेशनल पार्क के मुकाबले कहीं ज्यादा है. आंकड़ों पर जाएं तो पूरे देश में 2013-14 में 33 और 2014-15 में 28 लोगों की मौत बाघ के हमलों में हुई थी. लेकिन पीलीभीत में 2017 में ही अब तक 17 लोग अपनी जान गवां चुके हैं. गलती किसकी है इनसानों की या फिर बाघ की. हमले क्यों नहीं रुक रहे, इन हमलों के पीछे की वजह क्या है, क्यों प्रशासन के प्रयासों के बाद भी हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं, आईए जानते हैं…

पीलीभीत में 17वीं मौत जिस शख्स की हुई है उसका नाम बब्लू सरदार था. 45 साल के बब्लू की गलती थी या बाघ की. ये कह पाना अभी मुश्किल है. लेकिन हमले का पैटर्न पुराना था. एक बार फिर हमला गन्ने के खेत में ही हुआ. बब्लू खेत में काम करने गया था. जहां गन्ने के खेत में बैठे एक बाघ ने उस पर हमला कर दिया. हालांकि बाघ ने उसे खाया नहीं, जिससे ये बात तो साफ हो गई कि बाघ आदमखोर नहीं है.

सरकार मैन-टाइगर कॉन्फ्लिक्ट्स रोकने की खूब कोशिश कर रही है. लेकिन फिर भी जमीनी स्तर पर हालात नहीं सुधर रहे. हाल ही में भारत ने वाइल्डलाइफ एक्शन प्लान भी लॉन्च किया है. ये प्लान हमारे देश में वाइल्डलाइफ को बचाने की दिशा में उठाए गए अहम कदमों में से एक है.

आपको बता दें कि पहला प्लान 1983 में बनाया गया था और दूसरा 2002 से 2016 के बीच. लेकिन इस बार इसमें पहली बार कुछ ऐसी चीजों को शामिल किया गया है, जिनका आने वाले समय में अच्छा रिजल्ट देखने को मिल सकता है.
थर्ड एक्शन प्लान इसलिए भी अहम है, क्योंकि इसमें पहली बार क्लाइमेट चेंज से वाइल्डलाइफ पर होने वाले बुरे प्रभाव का जिक्र किया गया है. वाइल्डलाइफ कनजरवेशन में बढ़ते प्राइवेट सेक्टर के रोल को भी रेखांकित किया गया है. लेकिन इस प्लान को देखने के बाद भी ये साफतौर पर नहीं कहा जा सकता कि इससे पीलीभीत की समस्या का हल हो सकेगी या नहीं.

सभी बाघ आदमखोर नहीं
पीलीभीत में इनसानों की जान लेने वाला हर बाघ आदमखोर नहीं है. यहां पूरी तरह से स्वस्थ बाघ भी इनसानों पर हमला कर रहे हैं. बब्लू के मामले में भी ऐसा ही हुआ है. बब्लू पर जिस बाघ ने हमला किया था उसकी उम्र महज ढाई साल बताई जा रही है. और वो पूरी तरह से स्वस्थ बाघ है. बब्लू और बाघ का शिकार बनने वाले अन्य लोगों के मामलों को थोड़ा करीब से देखें, तो कहानी कुछ और ही नजर आती है. अधिकारियों की मानें तो बाघ अचानक से इनसान को अपने इतना करीब देख चौंक गया और उसने हमला कर दिया. गन्ने के खेत बाघों को छिपने की माकूल जगह देते हैं. यही कारण है कि यहां एक बाघिन अपने बच्चों के साथ छह महीनों तक आराम से रही.

उन्होंने आगे बताया कि 2013 में भी यूपी के दो जिलों मुरादाबाद और बिजनौर में लोगों में डर का माहौल था. उस वक्त एक मैनईटर ने छह लोगों को मारा था. लेकिन फिर भी उसे ढूंढ पाना बेहद मुश्किल था. बाघिन शिकार करती और बचकर निकल जाती. रह जाते थे तो बस उसके पंजों के निशान. लोगों में इस कदर डर बैठ गया था कि उन्होंने खेतों में जाना छोड़ दिया था. कुछ कहते थे उनके खेतों पर कोई बुरा साया मंडरा रहा है. तो कुछ ने बाघिन को ‘साइलेंट किलर’ का नाम दिया था.

आसिफ खान ने बताया कि इस मामले में बाघिन के मैनईटर बनने के पीछे का सबसे बड़ा कारण इनसान था. उन्होंने कहा कि बाघिन ने जब बच्चे दिए थे, तो पोचर्स (शिकारियों) ने उसके बच्चे
उठा लिए थे. जिससे बाघिन खतरनाक रूप से आक्रामक हो गई थी और इनसानों की जान की दुश्मन हो गई थी.
नहीं ली सीख तो फिर गंवानी पड़ेगी जान

उन्होंने एक और मजेदार किस्सा बताया अप्रैल 2016 का, जब नजीबाबाद फॉरेस्ट रेंज में गन्ने के खेत में एक किसान को तेंदुए के बच्चे मिले और वो उन्हें बिल्ली के बच्चे समझ कर उठा लाया. लेकिन जब बाद में पता चला कि ये बच्चे तेंदुए के हैं, तो सभी दंग रह गए. बच्चों को चीड़ियाघर में डाल दिया गया. लेकिन इस पूरे मामले को देखते हुए लगता है कि हमने साइलेंट किलर की कहानी से कोई सीख नहीं ली

साइलेंट किलर की ही तरह इस बात के पूरे चांसेज थे कि तेंदुए मां भी बच्चों के जुदा होने के गम में इनसानों की जान की दुश्मन बन सकती है. हालांकि ऐसा नहीं हुआ, लेकिन तेंदुए बच्चों को बिना बात के कैद में डाल दिया गया.
अगर हमें बाघ के हमलों को रोकना है और जंगल और वन्यजीवों को बचाना है, तो जानवरों के बर्ताव और रहन-सहन को समझना होगा. क्योंकि जानवर को मारने से विवाद खत्म नहीं होगा, बल्कि एक दिन जानवर खत्म हो जाएंगे.

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