18 से कर्णेश्वर धाम सिहावा मे पांच दिवसीय मेला का होगा आयोजन

- राजशेखर नायर

नगरी: सिहावा अंचल को प्राचीन काल का ऋषि बाहुल्य क्षेत्र व तप भूमि कहा गया है। पौराणिक गाथाओं से विदित होता है कि आदि कल में यहाँ श्रृँगी ऋषि, ब्रम्हर्षि, लोमस, अगस्त्य, कर्क, सरभँग, मुचकुँद, अँगिरा ऋषि का यहाँ तप क्षेत्र रहा है। ऋषियोँ के तप साघना केँद्र होने के कारण समय- समय पर यहाँ देवताओं का आगमन हुआ।

देउर पारा सिहावा में महर्षि श्रृँगी ऋषि के आश्रम के समीप कर्णेश्वरधाम मे माघ पूर्णिमा के अवसर पर 18 फरवरी से विशाल मेला का आयोजन प्रति वर्ष अनुसार किया जा रहा है। कर्णेश्वर धाम मे सोमवंसी राजाओं द्वारा निर्मित भगवन शिव एवं राम जानकी का मंदिर है।

मंदिर में लगे सोलह पंक्तियों की आयताकर भीतर शिलालेख कांकेर के सोमवंशी राजा कर्णराज के शासनकाल में शक् सम्वत 1114 में उत्कीर्ण कराया गया। शिलालेख संस्कृत भाषा के देवनागरी लिपि में लिखी गयी है।शिलालेख से विदित होता है कि महराज कर्णराज ने अपने वंश की कीर्ति को अमर बनाने के लिए कर्णेश्वर देवहद मे छह मंदिरों का निर्माण किया।

एक अपने नि संतान भाई कृष्णराज के नाम, दूसरा मंदिर प्रिय पत्नी भोपालादेवी के नाम निर्मित कराया। कर्णराज ने त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना कर प्रतिष्ठा किया। कर्णराजद्वारा निर्मित मंदिर मे शिव के अलावा मर्यादा पुरुषोत्तम राम जानकी मंदिर प्रमुख है।

भगवान शिव को बीस वर्ग फुट आयताकार गर्भ गृह में प्रतिष्ठित किया गया ही। गर्भगृह का शीर्ष भाग कलश युक्त है। मंदिर का अग्रभाग मंडप शैली मे बना है, जिसकी छत आठ कोडीय प्रस्तर स्तंभों पर टिक़ी है। मंदिर का पूरा भाग पाषाण निर्मित है।

जनश्रुति है कि कांकेर के सोमवंशी राजाओं के पूर्वज जग्गनाथपूरी उड़ीसा के मूल निवासी थे। सोमवंशी राजाओं ने पहले पहल नगरी मे अपनी राजधानी बनायी। कर्णेश्वर धाम मे एक प्राचीन अमृतकुण्ड है।किवदंती ही कि इस कुंड के जल के स्नान से कोड जैसे असाध्य रोग ठीक हो जाता था।

सोमवंशी राजाओ ने इसे मिट्टी से भर दिया। अमृतकुंड से लगा हुआ छोटा सरोवर राजा के दो पुत्रियां सोनई-रूपई नाम से जाना जाता है। 19 मार्च को मघपुर्णिमा के पवन अवसर पर हजारों श्रद्धालु सोंढूर, बालका व महानदी के त्रिवेणी संगम ने अस्थ की डुबकी लगाकर पुण्य के भागीदार बनेगे।

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