पवित्र ग्रंथ को भी आज व्यापार बना दिया : ज्योतिर्मयानंद गिरि

पवित्र ग्रंथ को भी आज व्यापार बना दिया : ज्योतिर्मयानंद गिरि

रायपुर । श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र ग्रंथ को भी कुछ लोगों ने आज व्यापार बना दिया है। इसके लिए जिम्मेदार उस प्रकार के कथाकार और वे लोग हैं जो उनसे जुड़कर उन्हें महिमामंडित कर रहे हैं। ये बातें स्वामी ज्योतिर्मयानंद गिरि ने आशीर्वाद भवन में श्रीमद्भागवत कथा में प्रसंग में कही।

उन्होने कहा कि, आज कथाकार का महत्व भी भीड़ और प्रचार तंत्र को आंकलित करके किया जाता है। यदि भीड़ ही मापंदड है तो यह किसी भी तरीके से जुटायी जा सकती है, कथा करने वालों ने ही यह परिस्थिति पैदा की है। जिसको कुछ नहीं चाहिए वही साधु है, कथा में बैठे हैं तो किसी की जेब काटने के लिए नहीं गोविंद की कथा सुनाकर उनके बताये सच्चे राह पर चलना और दूसरों की सेवा और परोपकार में सदाचार जीवन जीना। यदि मन में पाप लेकर कथा में बैठे हैं तो श्रवण नहीं कर पायेंगे और न ही उसका फल मिलेगा।

उन्होनें कहा कि, मानव जीवन कई योनि के बाद प्राप्त हुआ तो इसे व्यर्थ न जानें दें। वैसे ही भगवत कथा और सत्संग सहज ही नहीं मिलती है। कथा में जाएं तो पूरे मनोयोग से जाएं, मन में पाप है-बैठे कथा स्थल पर हैं, लेकिन मन कहीं और विचरण कर रहा है तो ऐसे में कथा का लाभ नहीं ले पायेंगे। कपट को जीवन से निकालो और निर्मल बनकर कथा सुनो। आपको समय, संपत्ति और शक्ति मिली है यदि उसका सही उपयोग नहीं किया तो भगवान उसे छीन लेते हैं। बुरे कर्म का पाप किसी और को नहीं आपको ही लगना है। भौतिकता की चकाचौंध में हम भटक गए हैं।

कथावाचक ने आगे बताया कि आज कथा और कथाकार का भी आंकलन किया जाने लगा है। यहां छोटे और बड़े के रूप में महिमामंडन हो रहा है,लेकिन बड़ा वही है जो परमात्मा के स्वरूप को ठीक से जानता है और उसे उसी रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन आज कुछ ऐसे लोग आ गए हैं जिन्होने श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र ग्रंथ को भी व्यापार बना दिया है। बड़ी भीड़ और बड़े बनने के चक्कर में सनातन धर्म का सत्यानाश कर दिया है और ऐसे लोगों के अनुयायी भी उसे वैसा ही प्रचारित करने में लगे हैं। उस नाम का कोई अर्थ ही नहीं हैं जो परमात्मा से जोडऩे और मुक्ति का मार्ग न बताता हो।

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