आज हम संतान हीनता के विभिन्न ज्योतिष योगों के विषय में चर्चा… आचार्य पं. श्रीकान्त पटैरिया

संतान हीनता मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। शास्त्रों में संतान के महत्व को इतने विस्तार से समझाया गया है कि जातक की सद्गति संतान के बिना नहीं हो सकती। ज्योतिष विज्ञान में संतान का कुंडली के पंचम भाव से विचार किया जाता है एवं इसका कारक ग्रह बृहस्पति होता है। आज के लेख में हम संतान हीनता के विभिन्न ज्योतिष योगों के विषय में चर्चा करेंगे।

आचार्य पं. श्रीकान्त पटैरिया (ज्योतिष विशेषज्ञ) छतरपुर मध्यप्रदेश

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संतान हीनता के ज्योतिषीय योग

१- यदि किसी जातक की कुण्डली में पंचमेश लग्न में पाप ग्रह से पीड़ित होकर अशुभ योग करके बैठा है तो जातक संतानहीन होता है।

२- यदि किसी जातक की कुण्डली में पंचमेश चतुर्थ भाव में नीच का हो या शत्रु भाव में स्थित हो या पाप ग्रह से पीड़ित हो तो वह व्यक्ति संतानहीन होता है।

३- यदि किसी जातक की कुण्डली में पंचमेश छठे भाव में नीच राशि का या शत्रु क्षेत्री या पीड़ित हो तो ऐसा जातक संतानहीन होता है।

४- यदि किसी जातक की कुण्डली में लग्न,पंचम,अष्टम,एवं द्वादश भावो में पापी ग्रह हो तो ऐसे व्यक्ति का वंश नष्ट हो जाता है।

५- यदि लग्न में मंगल,अष्टम भाव में शनि हो तथा पंचम भाव में सूर्य स्थित हो,ऐसे योग में जन्मे व्यक्ति का वंश नष्ट हो जाता है।

६- यदि सप्तम भाव में शुक्र हो,दशम भाव में चंद्र हो और चतुर्थ स्थान में पापी ग्रह बैठे हो ऐसे योग में उत्पन्न व्यक्ति का वंश नष्ट हो जाता है।

७- यदि चंद्र से अष्टम भाव में पापी ग्रह हो तो भी ऐसे योग में जन्मे व्यक्ति का वंश नष्ट हो जाता है।

८-यदि लग्न,पंचम,अष्टम,द्वादश भाव में पापी ग्रह हो अथवा लग्न में मंगल हो अष्टम भाव में शनि तथा पंचम भाव में सूर्य हो तो ऐसे योग में जन्मे जातक का वंश नष्ट हो जाता है।

९- पंचमेश,धनेश, सप्तमेश से युक्त भागयेश(नवमेश)का नवांश पापी ग्रह का हो अथवा पाप युक्त हो तो संतान हीनता का योग होता है।

१०- लग्नेश से युक्त मंगल अष्टम भाव में हो और पंचमेश क्रूर ग्रह के षष्ठांश में हो तो भी संतानहीनता का योग बनता है।

११- यदि किसी जातक की कुण्डली में गुरु लग्नेश एवं सप्तमेश या पंचमेश क्रूर ग्रह के षष्ठयांश में हो तो संतान हीनता का योग होता है।

१२- लग्नेश एवं पंचमेश छठे,आठवे या बारहवे भाव में हो तथा कारक ग्रह नीच राशि में हो और पंचम भाव में कोई पापी ग्रह बैठा हो तो संतानहीनता का योग होता है।

१३- यदि कुण्डली में गुरु क्रूर ग्रह के षष्ठयांश में हो,पंचम भाव में अष्टमेश भाव का स्वामी हो तथा पंचमेश अष्टम भाव में परस्पर स्थान परिवर्तन कर के बैठे हो तो भी संतानहीनता का योग बनता है।

१४- यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में सुर्य पंचम भाव में शुभ ग्रहो से दृष्ट ना हो अथवा अष्टम भाव में नीच का या शत्रु क्षेत्री शुक्र या गुरु हो अथवा गुरु,शुक्र साथ साथ युति करके बैठे हो या पंचम भाव में तीन-चार पापी ग्रह हो और अष्टम भाव में मंगल हो तो ऐसे व्यक्ति की कोई संतान जीवित नहीं रहती।

१५- यदि पंचमेश सूर्य,मंगल या शनि हो और वह पंचम छठे या बारहवे भाव में बैठा हो तथा पंचम भाव में शुभ ग्रहो की दृष्टि ना हो तो ऐसे व्यक्ति की संतान नहीं होती।

१६- यदि किसी जातक की कुण्डली में लग्नेश,गुरु, पंचमेश एवं सप्तमेश चारो कमजोर हों तो भी ऐसे जातक के संतान नहीं होती।

१७- यदि किसी जातक की कुण्डली में लग्न से, चंद्र से,एवं गुरु से पंचम भाव में पापी ग्रह हो तथा शुभ ग्रह से युत या दृष्ट ना हो तो ऐसे व्यक्ति के संतान पैदा नहीं होती।

१८- यदि किसी महिला की कुण्डली में सूर्य लग्न में हो और शनि सप्तम भाव में हो अथवा सूर्य शनि युति करके सप्तम भाव में हो और गुरु की दशम भाव में दृष्टि हो तो ऐसी महिला गर्भ धारण के योग्य नहीं होती।

१९- यदि किसी महिला की जन्म कुण्डली में शनि मंगल छठे या चतुर्थ भाव में हो तो भी ऐसी महिला गर्भ धारण के योग्य नहीं होती।

२०- यदि किसी महिला की कुण्डली में शनि की षष्ठेश के साथ युति हो अथवा शनि छठे भाव में हो और चंद्र सप्तम भाव में हो तो ऐसी महिला गर्भ धारण नहीं कर सकती।

२१- जिस स्त्री की कुण्डली में अष्टम भाव में बुध हो, नीच राशि ,अस्त शत्रु क्षेत्री बुध पर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि ना हो तो ऐसी स्त्री ककवंध्या कहलाती है।केवल एक बार सफल या असफल गर्भ धारण करती है।

२२- जिस स्त्री की कुण्डली के लग्न में राहु,सूर्य,मंगल स्थित हो तो वह अवश्य विधवा होती है।लग्न में सूर्य-मंगल-राहु और दूसरे भाव में शुक्र स्थित हो तो वह स्त्री विधवा होकर दूसरा विवाह कर लेती है।

२३- जिस स्त्री की कुण्डली में शनि मंगल सिंह राशि के ग्रह हो और चंद्र एवं शुक्र लग्न में हो तथा पंचम भाव में पाप ग्रहो की दृष्टि हो तो वह नारी वंध्या होती है।

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