बस्तरिया बाला के कैमरे में कैद होंगे तालीवुड के अदाकार

छायांकन की इस खास विधा से तय करेंगी मुकाम
देश के चयनित चालिस सिनेमेटोग्राफर में इकलौती लड़की
पिता के आदर्श पर चलकर किया सफर तय

–अनुराग शुक्ला

छायाकार या फोटोग्राफी के निर्देशक (डीपी) वास्तव में फिल्म की शूटिंग के प्रभारी व्यक्ति होता है। वह कैमरे और प्रकाश विभागों का प्रमुख है, और इस तरह उसकी किसी भी फिल्म के निर्माण में एक बड़ी भूमिका है। सिनेमेटोग्राफी की शक्ति एक सिनेमाई सिंटैक्स की महत्ता के जरिए खुशी, उदासी, हास्य और डर के भावनाओं को उभरने वाली है, जिसे एक सदी से भी ज्यादा समय से विकसित किया गया है। शॉट आकार, कोण एक असाधारण कैमरेवॉक का दिल है, जो भावनाओं को बढ़ाने के लिए तैयार की गई प्रकाश व्यवस्था के साथ मिलकर, छायांकन का सार बनाते हैं।

जगदलपुर. छह साल की बच्ची ने जब शादी के एक जलसे में अपने उम्र से वजनी कैमरे को उठाया उसी दिन उसके पिता ने यह तय कर लिया था कि वे अपनी बेटी और उसके कैरियर के बीच नहीं आएंगे। इस पिता ने इसके बाद से ही अपनी बेटी का हमेशा हौसला बढ़ाया और उसे किसी बेटे से कमतर नहीं रखा। आलम यह था कि इस बच्ची ने अब से बीस साल पहले आजाद भारत के पचास वर्ष संबंधी फोटो प्रदर्शनी में हिस्सा लिया और उसे दिल्ली में सराहा भी गया।

आज नन्ही सी बच्ची उम्र के साथ अपने शौक और पिता के दिलाए साहस से अपना मुकाम तय करने में सफल हुई। हम बात कर रहे हैं विशाखा भट्टाचार्य की जिसका चयन अब सिनेमेटोग्राफर के तौर पर फिल्म एण्ड टेलिविजन इंस्टिट्यूट हैदराबाद में हुआ है। विशाखा शहर के चिरपरिचित कैमरामैन और कलाकार विश्वजीत भट्टाचार्य की बेटी हैं। हाल ही में हैदराबाद में देश भर से युवक और युवतियों ने छायाकार बनने के लिए परीक्षा दी। इस परीक्षा में सभी को अपने हुनर का प्रदर्शन करना था। विशाखा ने जिस तरह से अपना काम निर्धारित समय से पहले महज पंद्रह मिनट में किया और जिस गुणवत्ता से उसने काम को अंजाम दिया सभी भौचक रह गए। चयनकर्ताओं ने उसे यहां तक कह दिया कि अब मुलाकात क्लास में होगी। विशाखा के कार्य को देखते संस्था ने उसे स्कॉलरशिप देने का फैसला किया और फीस में 75 फीसदी की राहत दी। चयनित चालिस लोगो में विशाखा अकेली लड़की है। इस संस्था की खासियत यह है कि यह संस्था जॉब की पूरी गारेंटी लेता है। फिलहाल विशाखा को सिनियर के अंडर में रहकर छायाकारी के गुण और दोष को सीखना है। इससे उसे आने वाले समय में सिनेमेटोग्राफर बनने का मौका मिलेगा। अभी असिस्टेंट छायाकार के तौर पर वो बड़े नाम वालों के साथ काम करेगी। सिनेमेटोग्राफी के कोर्स में फिल्म एसेसमेंट, बेसिक शार्ट फिल्मस, म्यूजिक विडियो और पांच मिनट की तीन डाक्यूमेन्ट्रिी बनाने का कार्य इस साल उसे संस्था में रहते करना है। जिसके आधार पर ही उसका आंकलन होगा। इसके बाद बस्तरिया बाला के कैमरे में टालीवुड के अदाकार कैद होंगे जिन्हे वो जनता के बीच कुछ इस तरह परोसेगी कि सितारे अपने चाहने वालों के दिलों पर राज करेंगे।

पिता ने सिखाया लक्ष्य से भटको नहीं

विशाखा बताती है कि उसके पिता विश्वजीत भट्टाचार्य यदि उसे जीवन के हर मुकाम में सहयोग नहीं करते तो शायद वो आज यहां तक नहीं पहुंच पाते। वो कहती है कि पिता ने हमेशा कहा कि तुम्हें जो करना है उसमें रम जाओ। उसकी हर बारीकि को सीखो, लक्ष्य से भटको नहीं तभी अंजाम तक पहुंच सकोगे। ऐसा ही कुछ हुआ जो मुझे अच्छा लगा उसमें पिता ने पूरा सहयोग किया। कम उम्र में कैमरा चलाना, विडियो बनाना, फोटोग्राफी करना मेरा शौक था जो अंतत: कैरियर बना।

पोस्टमार्टम की करती थी विडियोग्राफी

विश्वजीत भट्टाचार्य बताते हैं कि जब विशाखा छोटी थी करीब पंद्रह साल की तब से वो हमेशा अपने साथ ही उसे रखते थे। सामान्य फोटोग्राफी तो सभी करते हैं लेकिन बतौर लड़की मैने कभी यह नहीं सोचा कि बच्चे के मन में डर या भय हो इसलिए मैने खुद ही उसे अस्पताल में होने वाले पोस्टमार्टम की विडियोग्राफी के लिए प्र्रेरित किया। बच्ची जिस लगन से इस कार्य को करती थी इसे देखकर बड़े भी सहम जाते थे। आलम यह हुआ कि अस्पताल प्रबंधन ने ही बच्ची को ऐसी विडियोग्राफी करने पर रोक लगाने को कहा।

हालीवुड, बालीवुड की तर्ज पर तालीवुड

भारत में फिल्म उघोग के क्षेत्रियकरण के बाद से हर राज्य अपने इस इंडस्ट्री को अलग नाम से प्रमोट कर रहा है। जिस तरह विदेशी फिल्मों को बालीवुड के नाम से मुम्बई के फिल्म उघोग को बालीवुड के नाम से, छत्तीसगढ़ मे छालीवुड कहा जा रहा है इसी तरह आंध्र के अलग होने के बाद से तेलंगाना के फिल्म उघोग को तालीवुड के नाम से जाना जा रहा है। विशाखा के अनुसार उसके पास बालीवुड का रास्ता भी खुला है लेकिन फिलहाल तालीवुड में फिल्मों को लेकर बहुत स्कोप है, इसलिए उसने तालीवुड में ही रहकर अपना कैरियर बनाना तय किया है।

Back to top button