आरएफए मशीन से किडनी, लीवर-फेफड़े के ट्यूमर का इलाज

रायपुर : पं. जवाहर लाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय से सम्बद्ध डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय रायपुर में हाल ही में स्थापित रेडियोफ्रीक्वेंसी एबलेशन मशीन के जरिए किडनी, लीवर एवं फेफड़े के ट्यूमर का इलाज उपलब्ध है। चिकित्सालय के रेडियोडाग्नोसिस विभाग में स्थापित इस मशीन के जरिए ऐसे ट्यूमर जो शरीर के अंग के भीतर उत्पन्न हों या पूरे अंग में फैल गए हों उन्हें एबलेशन विधि से नष्ट किया जा सकता है। चिकित्सकीय भाषा में इन ट्यूमरों को प्रायमरी ट्यूमर और मेटास्टेटिस ट्यूमर कहा जाता है। रेडियोफ्रीक्वेंसी एबलेशन यानी आरएफए के जरिए अधिकतम 5 से 10 सेमी. तक के ट्यूमर को आसानी से नष्ट कर सकते हैं। अभी तक राज्य के बाहर उच्च चिकित्सकीय संस्थान में ही इस विधि से इलाज की सुविधा उत्पन्न थी। कैंसर विभाग एवं रेडियोडाग्नोसिस विभाग के संयुक्त सहयोग से वर्तमान में इस मशीन से लीवर ट्यूमर के दो मरीज, किडनी ट्यूमर के दो मरीज तथा हड्डी ट्यूमर के दो मरीजों का इलाज किया गया है। किडनी एवं लीवर ट्यूमर के दोनों मरीज चिकित्सालय में भर्ती हैं।

21 वीं सदी में इलाज की उन्नत तकनीक : रेडिएशन आंकोलॉजिस्ट डॉ. विवेक चौधरी कहते हैं कि ट्यूमर के इलाज की दिशा में आरएफए प्रोसीजर 21 वीं सदी का बेहद उन्नत किस्म की तकनीक है जिसकी सहायता से ट्यूमर या अन्य बेकार (डिसफंक्शनल) ऊतकों को बिना किसी जटिलता के नष्ट किया जा सकता है। इमेज गाइडेड (एक्स-रे, सीटी स्कैन, अल्ट्रासांउड) उपचार की इस तकनीक से ट्यूमर वाले रोगियों का इलाज आसान होगा।

क्या है रेडियोफ्रीक्वेंसी एबलेशन : रेडियोडायग्नोसिस विभाग के एचओडी डॉ. एस. बी. एस. नेताम कहते हैं रेडियोफ्रीक्वेंसी एबलेशन दो शब्दों से मिलकर बना है। रेडियोफीक्वेंसी यानी उच्च आवृत्ति वाली रेडियो तरंगे। एबलेशन यानी किसी भी चीज का पृथक्करण करना अथवा उसको अंदर ही अंदर जलाना या नष्ट करना। संक्षेप में कहें तो उच्चा ऊर्जा युक्त रेडियो तरंगों के माध्यम से किसी कोशिका को अंदर ही अंदर जलाना या नष्ट करने की प्रक्रिया रेडियोफ्रीक्वेंसी एबलेशन के नाम से जानी जाती है और इस विधि को जिस मशीन के माध्यम से किया जाता है उसे रेडिओफ़्रीक्वेंसी एबलेशन मशीन या आरएफए मशीन कहते हैं।

कैसे किया जाता है : रेडियोडाग्नोसिस एक्सपर्ट डॉ. विवेक पात्रे कहते हैं कि सबसे पहले सीटी स्केन, अल्ट्रासाउंड एवं एमआरआई के जरिए ट्यूमर की सटीक स्थिति का पता लगाया जाता है। उसके बाद सीटी स्केन या अल्ट्रासाउंड मशीन की मदद से ट्यूमर की जगह पर आरएफए मशीन से कनेक्टेड सुई डालकर इलेक्ट्रोड की सहायता से रेडियोफ्रीक्वेंसी तरंगे गुजारी जाती हैं जिससे ट्यूमर के ऊतकों का तापमान बढ़ जाता है और वे नष्ट हो जाते हैं।

आरएफए प्रोसीजर की विशेषता : मरीज को ज्यादा देर तक अस्पताल में भर्ती रहने की जरूरत नहीं रहती। अतिरिक्त खून चढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। चीरे लगाने की जरूरत नहीं पड़ती जिससे शरीर में निशान नहीं रहते। एनीस्थिसिया का रिस्क-जोखिम बेहद कम रहता है।

इन बीमारियों का होता है इलाज : लगभग 60 लाख की लागत वाली तथा जर्मनी से आयातित इस मशीन की सहायता से वेरीकोज वेन, लीवर, किडनी एवं लंग्स (फेफड़े) के ट्यूमर, हड्डियों में होने वाले ट्यूमर का इलाज किया जा सकता है। अब तक केवल महानगरों में ही मिलने वाली इस पद्धति के उपचार की सुविधा का खर्च अम्बेडकर अस्पताल में बीपीएल मरीजों को पूर्णतः निः शुल्क है।
विशेषज्ञों की टीम : आरएफए प्रोसीजर करने वाले डॉक्टरों की टीम में डॉ. एसबीएस नेताम, डॉ. विवेक पात्रे, डॉ. आनंद जायसवाल, डॉ. सीडी साहू, डॉ. राजेश सिंह, डॉ. संजय कुमार, डॉ. दीपक जैन, डॉ. आनंद बंसल साथ में एनेस्थेटिस्ट डॉ. अर्नव एवं रेडियोटेक्नीशियन की टीम शामिल है।

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