इन डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ चुके हैं ट्राइफेड उत्पाद

आदिवासी और जनजातीय समूह सीधे कमा रहे मुनाफा

आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल की वजह से स्थानीय उत्पादों के साथ ही आदिवासी और जनजातीय समूह को सबसे ज्यादा लाभ मिल रहा है। ऐसे में आदिवासी समाज द्वारा तैयार किए गए उत्पादों को सीधे बाजार में और ग्राहक तक कैसे पहुंचाया जाए, इसके लिए जनजाति मंत्रालय कई योजनाओं पर काम कर रही है, जिससे उनका मुनाफा और आजीविका को बढ़ाया जा सके।

इसी के तहत ऑर्गेनिक, प्राकृतिक वन धन उत्पादों और ट्राइफूड उत्पादों के प्रचार और बिक्री के लिए ट्राइफेड वन धन और बिग बास्केट के बीच समझौता हुआ है। केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा का कहना है कि सरकार की ओर से उठाए जा रहे कदम आने वाले समय में जनजातीय लोगों की आजीविका के लिए गेम चेंजर साबित होंगे। यानि इस समझौते के बाद वन धन समूह के उत्पाद को उपभोक्ता सीधे बिग बास्केट से भी खरीद सकते हैं।

मालिक बनकर बेच रहे अपने उत्पाद

डिजिटल इंडिया में समाज के हर तबके के लोगों को साथ लेकर चलने और रोजगार के अवसर दे कर उनकी आजीविका में सुधार लाने के लिए की तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसी क्रम में अब जनजातीय लोगों द्वारा बनाए गए उत्पादों की बिक्री के लिए ऑनलाइन व्यवस्था शुरू की गई है। इसके चलते दूर जंगलों व छोटे-छोटे गांवों में मौजूद जनजातीय लोग अब अपना सामान मजदूर बनकर नहीं बल्कि मालिक बनकर बेच रहे हैं। अब बिग बास्केट, जो की ई-किराना, कंज्यूमर ई-कॉमर्स क्षेत्र में सबसे तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में से एक रहा है और देश के ज्यादातक उपभोक्ता इसका प्रयोग करते हैं।

ऐसे में जब आदिवासी समूह के उत्पाद को बिग बास्केट का प्लेटफॉर्म मिलेगा, तो न सिर्फ जरूरतमंद उपभोक्ता तक उनकी पहुंच बढ़ेगी बल्कि लाभ के साथ उन्हें आने वाले समय में बड़े ऑर्डर भी मिल सकेंगे। माना जा रहा है कि ये समझौता वोकल फॉर लोकल की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा। इससे आदिवासी समूह को अपने सामान को बेचने के लिए किसी बाजार-हाट या बिचौलिए का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

क्यों पड़ी जरूरत

वर्तमान कोरोना महामारी की वजह से लोग ऑनलाइन खरीदारी की ओर ज्यादा बढ़े हैं। उपभोक्ता अब घर पर सुरक्षित रहते हुए ही उच्च गुणवत्ता वाली किराने की वस्तु खरीदने की सुविधा चाहते हैं। बिग बास्केट 12,000 से अधिक किसानों और पूरे भारत में फैले बहुत से संग्रह केंद्रों के साथ मिलकर एक फार्म-टू-फोर्क सप्लाई चेन भी चलाता है, जिसमें यह अपने ग्राहकों के घर तक उच्च गुणवत्ता वाले ताजे फल तथा सब्जियां भी पहुंचता है।

ऐसे में अब आदिवासी समूह और जनजातीय समूहों के वन धन प्राकृतिक, खाद्यान्न, तेल, बेकरी, पेय पदार्थ, नाश्ता, सफाई और घरेलू सामान, सौंदर्य और स्वच्छता, व्यंजन आदि संभावित उत्पाद श्रेणियों में स्वास्थ्यवर्धक विकल्प हो सकते हैं। इससे जनजातीय समूह के साथ ही उपभोक्ता को भी सामान तक पहुंचने में आसानी होगी।

क्या होगा फायदा

कोरोना काल में सबसे ज्यादा आयुर्वेद पर जोर दिया गया। जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी आयुर्वेद की औषधियों और जड़ी बूटी को अच्छी तरह पहचानते हैं। इसमें गिलोय, महुआ के फूल, हरण आदि। इसके अलावा ऑर्गेनिक उत्पादों, जिनमें जेम, जेली, अचार, मुरब्बा, च्यवनप्राश जैसे कई उत्पाद शामिल है। उन्हें डिजिटल माध्यम से जोड़ने का सबसे फायदा यह हो रहा है कि पहले तो दूर बैठे भी मुख्यधारा में समर्थन मूल्य क्या चल रहा है इसका पता भी चल रहा है।

अगर वो जंगल से या कहीं से कुछ बेचने के लिए आवेदन करते हैं, तो पहले उन्हें मैसेज पहुंच जाता है कि बाजार में इसका समर्थन मूल्य इतना है, ताकि उन्हें भी लाभ पहुंचे। साथ ही अब उनके सामानों के बेहतर ब्रांड बनाने के लिए , पैकेजिंग, मार्केटिंग के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की योजना बनायी गयी है।

बिचौलियों के माध्यम से नहीं सीधे पहुंच रही राशि

दरअसल, इन योजनाओं के जरिए जनजातिय समूह को उत्पादों के बदले होने वाला लाभ सीधे उन्हें ही मिलेगा। इस बारे में हाल ही में ट्राइफेड के मैनेजिंग डायरेक्टर प्रवीर कृष्णा ने बताया कि वन-तुलसी से बनने वाला तेल करीब 20 हजार रुपये लीटर में बिकता है, लेकिन उन्हें पहले इसका लाभ नहीं मिलता था और आदिवासी समूह ये काम सैकड़ों सालों से कर रहा है। इसी तरह झाड़ू देश के 9 राज्यों में ही बनता है। लेकिन झाड़ू के लिए जो सामग्री आती है, वो उसे सस्ते में बेचते थे, करीब 10 रुपये किलों में बेच देते थे और और एक किलो में 4 झाड़ू तैयार हो जाती है।

उसके देश भर में वही झाड़ू 200 रुपये में एक बेची जाती है। इन सब में आदिवासियों को कोई फायदा नहीं होता था क्योंकि बिचौलिये शामिल थे, अब इसे खत्म कर दिया गया है। आदिवासियों को सही कीमत मिल रही है। इसे वैल्यू चेन कहते हैं। यहां अब आदिवासी मजदूर नहीं बल्कि मालिक के रूप में काम करने लगे।

डिजिटल ई-कॉमर्स से जुड़ रहे आदिवासी

वर्तमान में ट्राइफेड के पूरे देश में 100 से ज्यादा रिटेल स्टोर हैं, 28 राज्य इसमे पार्टनर हैं, जो जनजातीय समूह द्वारा बनाए उत्पादों बाजार की व्यवस्था करते थे। लेकिन कोविड के बाद लॉकडाउन रहा और उसके बाद अनलॉक हो चुका है। ऐसे में देखा गया की बिना डिजिटल स्कोप ने इन्हें एक बड़े बाजार तक पहुंचाना मुश्किल है। इसके लिए ई-मार्केट प्लस के लिए योजना बनाई गई। इसके तहत पांच लाख आदिवासियों को डिजिटल ई-कॉमर्स के तहत एक शॉप खुलवाने की योजना है।

ये लोग अपने सभी उत्पादों को देश-विदेश में ई-मार्केट के जरिए बेच सकेंगे। उनकी हर एक सामग्री को पोर्टल के साथ लिंक कर दिया जाएगा। इसके अलावा देश में 85 स्थानों पर दुकान थी, उसे भी डिजिटल से लिंक किया जा रहा है। इससे जनजातीय लोगों की आजीविका को भी बल मिलेगा। आदिवासी समूह के उत्पाद आज ट्राइब्स इंडिया की वेबसाइट के अलावा अमेजॉन, फ्लिपकार्ट, और सरकारी ई बाजार-जेम पर भी उपलब्ध हैं।

वन धन योजना बनी वरदान

2018 में आदिवासियों की आजीविका के सृजन के लिए प्रधानमंत्री वन धन योजना की शुरुआत की गई। इस योजना के जरिए आदिवासी समाज के आय को बढ़ाना और विकास का रास्ता दिखाना है।
योजना के अंतर्गत जनजातीय जिलों में वन धन विकास केंद्र जनजातीय समुदाय के जरिए संचालित किए जा रहे हैं। हर केंद्र 10 जनजातीय स्वयं सहायता का निर्माण किया गया है , साथ ही हर समूह में करीब 30 जनजातीय संग्रहकर्ता शामिल होकर अपने उत्पाद लाते और बनाते हैं।

देश में हर साल 2 लाख करोड़ रुपए की वन संपदा निकलती है। वहीं योजना के अंतर्गत 1,151 से ज्यादा वन धन केंद्र बनाए गए हैं, जिसमें 300 से ज्यादा आदिवासियों का समूह कार्य कर रहा है। यहां उन्हें उनके सामानों को संग्रहित करके पैकेजिंग और गुणवत्ता जोड़ कर उद्यमी बनाया जा रहा है। खास बात ये है कि इन समूहों को अब बड़ी-बड़ी कंपनियों से भी ऑर्डर मिलने लगे हैं।

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