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दो टूक – श्याम वेताल : आखिर, कब तक हंसना मना है ?

किसी के निधन पर जब अंतःकरण में पीड़ा हो तो वास्तविक एवं स्वाभाविक शोक परिलक्षित होता है. यह दिवंगत व्यक्ति के प्रति आत्मीयता या आस्था पर आधारित होता है. जबर्दस्ती शोकाकुल दिखलाई पड़ना महज आडंबर है लेकिन सामान्य लोकाचार के लिए ऐसा करना पड़ता है.

किंतु यह सामान्य लोकाचार की अवधि कितनी होनी चाहिए? किसी के घर में जब कोई व्यक्ति संसार से विदा लेता है तो क्या घर वाले सतत शोक में रहते हैं? एक दिन, दो दिन, एक सप्ताह, तेरह दिन या ज्यादा से ज्यादा 40 दिन… इससे अधिक तो घरवाले भी शायद ही शोक मनाते होंगे! शोक व्यक्त करने के लिए कोई घर आता भी है तो उसके साथ कुछ देर लोग गमगीन रहते हैं फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जिस दिन निधन हुआ, पूरा देश शोकाकुल रहा. सभी ने अपने-अपने ढंग से शोक व्यक्त किया. फिर उनकी अस्थियां देश की विभिन्न नदियों में विसर्जित करने के लिए उन्हें सभी राज्यों में भेजने की व्यवस्था हुई. सभी राज्यों के भाजपाध्यक्षों ने दिल्ली जाकर अस्थि-कलश प्राप्त किया. छत्तीसगढ़ भाजपा के अध्यक्ष धरमलाल कौशिक भी अस्थि कलश लेकर रायपुर आए. यहां अस्थि कलश की यात्रा निकाली गयी. यात्रा के बाद अस्थि कलश को भाजपा कार्यालय ले जाया गया.

वहां से पार्टी जिलाध्यक्षों को ये अस्थि कलश सौंपे जाने थे. उसी दौरान वहां प्रदेश के दो मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और अजय चंद्राकर आपसी बातचीत में किसी विषय पर हंसने लगे. फोटोग्राफरों ने यह दृश्य कैमरे में कैद कर लिया और सोशल मीडिया पर डाल दिया. देखते ही देखते यह सोशल मीडिया पर न केवल वायरल हुआ बल्कि इसकी निंदा भी शुरू हो गयी. बात दिल्ली तक पहुंचा दी गयी. हो सकता है, पार्टी मंत्रियों से स्पष्टीकरण भी मांग ले.

अब सवाल उठता है कि मंत्रियों के हंसने से क्या अटल जी का अपमान हुआ? क्या मंत्रिगणों की अटलजी के प्रति अश्रद्धा या अनास्था रही? उनके हंसने को अन्यथा क्यों लिया गया. क्या वहां मौजूद सभी लोग हंस-बोल नहीं रहे थे? सिर्फ मंत्रियों को क्यों निशाना बनाया गया? क्या उन्हें समाज और कैमरों के भय से रोनी सूरत बनाकर रखनी चाहिए थी? ऐसे मौके पर आखिर कब तक हंसने-बोलने पर पाबंदी होनी चाहिए?

जहां तक सामाजिक रीति-रिवाजों का प्रश्न है, किसी के यहां जब कोई व्यक्ति अपनी लंबी उम्र के बाद देवलोक जाता है तो बड़ी शान से उसकी अंतिम यात्रा निकाली जाती है और घर पर भी पीड़ा का वातावरण नहीं रहता है. कहा जाता है कि दिवंगत व्यक्ति को देवत्व प्राप्त हुआ इसलिए अतिरिक्त शोक मनाने की जरूरत नहीं है.

ईश्वर की कृपा से अटलजी ने भी लंबी आयु प्राप्त की और जीवन की सर्वोच्च सफलता हासिल की. विगत कई वर्षों से वे अत्यंत कष्ट में रहे. शरीर छोड़ने से उन्हें कष्टों से मुक्ति ही मिली. एक न एक दिन सभी को इस संसार से जाना है लेकिन सफल जीवन एवं लंबी आयु प्राप्त होना किसी पुण्यात्मा को ही नसीब होता है. अटलजी से बड़ा पुण्यात्मा कौन हो सकता है? हां जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें जो कष्ट भोगने पड़े उस पर सभी को दुख होना चाहिए और यही कामना करनी चाहिए कि उन्हें सद्गति प्राप्त हो.

मंत्रियों के हंसने पर अनावश्यक विवाद खड़ा करना कहीं से उचित नहीं लगता. हां, यह सभी का कर्तव्य होता है कि देश, काल एवं परिस्थिति के अनुरूप व्यवहार करे लेकिन यदि किसी ने इसका उल्लंघन भी किया हो तो उसे तूल देना बुद्धिमानी नहीं है.

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