जिसने जलियावालां में बहाया भारत का खून, उसके खून से लिखा इतिहास

उधम सिंह बलिदान दिवस पर विशेष

13 मार्च 1940 का दिन। लंदन के इंडिया हाउस से निकलकर एक भारतीय नौजवान शांत भाव से सैक्सटन हॉल की ओर बढ़ रहा था। सैक्सटन हॉल, जिसमें ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेन्ट्रल एशियन सोसाइटी की ओर से ‘विश्व शांति और अफगानिस्तान’ विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था। गोष्ठी के अध्यक्ष थे लॉर्ड जैटलैंड। ब्रिगेडियर जनरल सर पी. सैक्स पूर्वी देशों के सम्बंध में प्रमुख व्याख्यान देने वाले थे। इस गोष्ठी में पूर्वी देशों के विशेषज्ञ के नाते जनरल ओ डायर को मुख्य भाषण देने के लिए बुलाया गया था।

गोष्ठी प्रारम्भ होने से पहले ही वह भारतीय नौजवान सैक्सटन हॉल पहुंचकर श्रोताओं के लिए निर्धारित कुर्सियों पर जाकर बैठ गया। जैसे ही अंतिम एवं मुख्य वक्ता के रूप में जनरल ओ डायर बोलने के लिए उठ खड़े हुए, वैसे ही वह अचानक अपनी कुर्सी से उठा और अपनी जेब से रिवॉल्वर निकालकर तीन गज की दूरी से जनरल डायर पर गोली चला दी। वह जनरल डायर पर तब तक गोलियां बरसाता रहा जब तक कि रिवाल्वर खाली नहीं हो गई। जनरल डायर फिर कभी उठ न सका।

वह नौजवान जब आश्वस्त हो गया कि अब जनरल डायर इस दुनिया में नहीं रहा, तब शांत भाव से बिना घबराहट वह दरवाजे की ओर चल पड़ा। उसने हॉल के मुख्य प्रवेश द्वार पर मौजूद ब्रिटिश रॉयल एयरफोर्स के सार्जेंट क्लावरी चेस के हाथों खुद को गिरफ्तार करवा दिया। उसे गर्व तो इस बात का था कि आज उसने जलियांवाला बाग कांड में मारे गए निर्दोष, निरीह भारतीयों की मौत का बदला ले लिया है, जिसके लिए वह पिछले बीस साल से तड़प रहा था।

इस भारतीय नौजवान का नाम था सरदार उधम सिंह। उधम सिंह के इस वीरतापूर्ण कारनामे पर विनायक सावरकर ने कहा था, ‘देश में इस तरह के देशभक्त मौजूद हैं जो सरदार उधम सिंह की तरह 22 साल तक बदले की भावना को अपने मन में संजोये रहे और आखिरकार उन्होंने देशवासियों की मौत का बदला ले ही लिया।’

उधम सिंह का जन्म पंजाब के पटियाला जिले के सुनाम गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। कुछ लोग इनका जन्म तत्कालीन पंजाब और वर्तमान हरियाणा के यमुनानगर जिले के लाडवा कस्बे में हुआ मानते हैं। उनके पिता का नाम चोहड़राम व माता का नाम नारायणी देवी था।

बचपन में ही इनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया और इन्हें अनाथालय में रहना पड़ा। वहीं इन्होंने बढ़ईगीरी का काम सीखा। अनाथालय में रहते हुए ही इनका क्रांतिकारियों से सम्बंध जुड़ गया। 1928 में इन्हें क्रांतिकारियों को सहयोग देने के अपराध में गिरफ्तार किया गया।

चार साल की सजा काटने के बाद यह अमृतसर आ गए और यहां फर्नीचर की दुकान खोली। अमृतसर में उन्होंने अपना नाम राम मुहम्मद सिंह आजाद रखा। इसके पीछे उनका उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकता की भावना को बल प्रदान करना था। इस नाम से उधम सिंह सरदार भगत सिंह से भी बराबर पत्र-व्यवहार करते रहे।

वह कांग्रेस और गांधीजी की सत्याग्रह की नीति से संतुष्ट नहीं थे। विश्वयुद्ध ने इनकी बदले की भावना को और बढ़ाया।
उधम सिंह ने बाद में अपने बयान में कहा कि मैंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के नालदार जूतों के तले अपने देशवासियों को रौंदे जाते देखा है। मुझे इसकी कतई चिंता नहीं है कि मुझे आप फांसी देंगे या और सजा देंगे। मृत्यु का भय मुझमें नहीं है।

बुढ़ापे में लड़खड़ाते हुए जीने का कोई अर्थ नहीं होगा, देश के लिए जवानी में मर जाना कहीं ज्यादा अच्छा है। मैंने अपने देशवासियों के संहार का बदला लेकर अपने कर्तव्य को पूरा किया है, अब आप अपना काम कीजिए। उन पर मुकदमा चला और फांसी की सजा हुई। 31 जुलाई 1940 को हंसते-हंसते वह फांसी के फंदे पर झूल गए।

मुकदमे में बैरिस्टर वी.के. कृष्णा मेनन उनकी पैरवी करना चाहते थे लेकिन उधम सिंह ने मना कर दिया। उनके बलिदान के समय जर्मन अखबारों ने लिखा कि दुनिया यह देख ले कि भारतवासी बरतानिया हुकूमत के शासन में किस तरह सुखी हैं। उधम सिंह का बलिदान इसका प्रमाण है। उन्होंने अपने जीवन को दांव पर लगाकर सारी दुनिया को यह बता दिया है कि भारतवासी आजादी चाहते हैं और वह उसे लेकर रहेंगे।

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