यूरोप के लिए अमेरिका बना दुश्मन

वॉशिंगटनः ईरान परमाणु समझौता तोड़ने के बाद अमरीका दुनिया के लिए जहां विलेन बन गया वहीं के कई देशों के आंखों की किरकिरी बनता जा रहा है। आलम ये है कि वह यूरोपीय देशों की आंखों में भी खटकने लगा है। जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल मानती हैं कि यह डील तोड़कर अमरीका ने मध्य पूर्व की स्थिति को और बिगाड़ दिया है।यह बात उन्‍होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन से हुई मुलाकात के दौरान कही। दोनों नेताओं के बीच मध्य पूर्व के अन्य देशों की समस्याओं के साथ ही परमाणु समझौते से जुड़े बिंदुओं पर रूस के सोची शहर में चर्चा हुई।

मर्केल का कहना है कि यह समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को पारदर्शी बनाने के साथ उसे नियंत्रित रखने के लिए महत्वपूर्ण है। यूरोप के अन्य देशों की तरह जर्मनी भी इस समझौते से निकलना नहीं चाहता है। उन्‍होंने इस समझौते में बने रहने और इसका समर्थन करते रहने पर हामी भरी है। जर्मनी के सरकारी ब्रॉडकास्टर जेडडीएफ के सर्वे में करीब 82 फीसदी जर्मनवासियों का मानना है कि अमरीका अब भरोसमंद पार्टनर नहीं रह गया है। सर्वे में हिस्सा लेने वाले 36 फीसदी लोगों ने रूस को जर्मनी का मजबूत सहयोगी कहा है। 43 फीसदी लोगों को लगता है कि नया मजबूत साझेदार चीन हो सकता है।

बता दें कि मर्केल से पहले यूरोपीय यूनियन के अध्यक्ष डोनाल्ड टस्क ने भी अमरीका के ईरान परमाणु करार से हटने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा हमला बोला था। उन्होंने कहा था कि डोनाल्‍ड ट्रंप ने दोस्त से ज्यादा दुश्मन की तरह काम किया है। जिसके पास ट्रंप जैसा दोस्त हो, उसे दुश्मन की जरूरत नहीं पड़ेगी। इतना ही नहीं इस मुद्दे पर ईयू प्रमुख ने यूरोपीय नेताओं से ट्रंप के फैसले के खिलाफ संयुक्त यूरोपीय मोर्चा बनाने की अपील की। गौरतलब है कि वर्ष 2015 में ईरान के साथ अमरीका के अलावा रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने परमाणु समझौता किया था। हाल ही में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान परमाणु समझौते से निकलने के साथ दोबारा उसपर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है।

पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय हुए इस समझौते की ट्रंप हमेशा से आलोचना करते आए हैं। समझौता तोड़ते हुए उनका कहना था कि ईरान के परमाणु बम को रोका नहीं जा सकता है इसलिए यह समझौता तर्कसंगत नहीं है। वहीं दूसरी ओर यूरोपीय देश फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी पहले ही इस समझौते के साथ बने रहने की प्रतिबद्धता जता चुके हैं। यह पहला मौका नहीं है कि जब ईयू अमरीका के खिलाफ खड़ा हुआ है। इससे पहले उत्तर कोरिया के मुद्दे पर भी ईयू के कुछ देशों ने अमरीका के रुख से इतर बातचीत की संभावनाओं की खोजने और इसके लिए मध्‍यस्‍थता करने की बात कही थी।

advt
Back to top button