लस्सी में चाहिए वैरायटी, सीधे चले आएं जीटीबी चौक पर ‘शम्मी लस्सी वाला’

स्टूडेंट्स को ये लस्सी खासा लुभाती है.

व्यंजन: लस्सी का नाम याद आते ही जुबान और दिमाग ठंडा-ठंडा महसूस करने लगता है. अमूमन जब भी लस्सी का जिक्र होता है तो दही की लस्सी जुबान पर चढ़ेगी या मौसम के हिसाब से मेंगो लस्सी ही याद आएगी. लेकिन आज हम आपको दिल्ली की एक ऐसी दुकान पर लेकर जा रहे हैं, जहां 10 प्रकार की लस्सी मिलती है.

उनका स्वाद भी ऐसा कि मन मचल-मचल जाए. यहां दही की प्लेन लस्सी आपका गला तर कर देगी तो रबड़ी व अन्य लस्सी अंतरतम में ठंड की मौजूदगी महसूस करवाएगी. लस्सी में बर्फ का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होता, उसे ठंडा करने का सिस्टम यहां अलग है. इतने जायकों की लस्सी पिलाकर ये दुकान नाम कमा रही है. स्टूडेंट्स को ये लस्सी खासा लुभाती है.

प्लेन लस्सी तो है ही, रबड़ी लस्सी के अलावा शुगर फ्री लस्सी भी मिलेगी यहां

हम बात कर रहे हैं रिंग रोड स्थित किंग्सवे कैंप चौक (जीटीबी नगर) मेन रोड पर बनी ‘शम्मी भाई लस्सी वाला’ दुकान की. करीब 37 साल से चल रही यह दुकान लस्सी और उसकी वैरायटी को लेकर दिल्ली में नाम कमा रही है. अब सीधा लस्सी की बात करें. यहां सालों से 10 प्रकार की लस्सी बेची जाती है.

इनमें प्लेन दही वाली लस्सी के अलावा जीरा लस्सी, मेंगो, स्ट्राबरी, बटर स्कॉच, रबड़ी लस्सी, लस्सी विद आइसक्रीम, स्पेशल बादामी लस्सी तो मिलती है, अगर आप मधुमेह से पीड़ित हैं तो आपके लिए शुगर फ्री लस्सी भी मौजूद है. दुकान पर जायके और वैरायटी के हिसाब से ये लस्सी लगातार बनती रहती हैं.

बर्फ नहीं, फ्रीज में ठंडी होती है लस्सी, ऊपर से कुछ ‘खास’ भी डलता है

आपको बात दें कि लस्सी बनाते समय उनमें बर्फ का प्रयोग बिल्कुल भी नहीं किया जाता. लस्सी के नाम के हिसाब से उसमें निखालिस माल डाला जाता है. तैयार करने के बाद इन तरह-तरह की लस्सी को गिलासों में भरकर बड़े से फ्रीज में ठंडा करने के लिए रख दिया जाता है. उसके बाद ग्राहक जो लस्सी मांगता है, फ्रीज में लगी ठंडी लस्सी निकाली जाती है और लस्सी के मिजाज और स्वाद के अनुसार उसमें दही की मलाई, कटे हुए बादाम और काजू, बटर स्कॉच नट का चूरा आदि डालकर पेश कर दिया जाता है.

बगल में ही दिल्ली यूनिवर्सिटी और पूरे इलाके में एजुकेशन इंस्टिट्यूट हैं, इसलिए दुकान पर दिन-भर स्टूडेंट्स जरूर नजर आएंगे. मिजाज के हिसाब से लस्सी की कीमत 35 रुपये से लेकर 80 रुपये तक है. लोग कहते हैं कि लस्सी तो बहुत पी, लेकिन इतनी वैरायटी की लस्सी तो उन्हें दिल्ली में कहीं देखने को नहीं मिलती. विशेष बात है कि नाम के हिसाब से लस्सी में आपको उसका वही स्वाद मिलेगा.

लस्सी की क्वॉलिटी कंट्रोल की जिम्मेदारी बुजुर्ग पिता के पास

चूंकि यह इलाका बहुत पुराना है इसलिए दुकान भी बहुत पुरानी है, लेकिन वर्ष 1984 में यहां लस्सी बेचने की शुरुआत हुई. इस काम को शुरू करने वाले अशोक कुमार ने अपने बड़े बेटे शम्मी (शेखर अरोड़ा) के नाम से यह दुकान शुरू की. बाद में उन्होंने खास प्रकार के स्नैक्स आदि भी बेचने शुरू कर दिए. लेकिन दुकान के नाम के अनुरूप लस्सी ही नाम कमा रही है. अब दुकान को संभालने की जिम्मेदार शम्मी और छोटे भाई पंकज अरोड़ा के पास है.

लेकिन बुजुर्ग होने के बावजूद अशोक कुमार आज भी दुकान पर आते हैं. असल में वह अब क्वॉलिटी कंट्रोल का काम कर रहे हैं. वह जांच करते हैं कि दही ठीक तरह से जमा है, विभिन्न फ्लेवर्ड की लस्सी के स्वाद में बदलाव तो नहीं आया. इलाके के दुकानदार उन्हें खासा सम्मान देते हैं. सामान्य तौर पर यह दुकान सुबह 10 बजे खुल जाती है और रात 11 बजे तक कामकाज रहता है. दुकान में कोई अवकाश नहीं है.

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