विजय दिवस: इस कारगिल के हीरो ने 17 पाक सैनिकों को मार गिराया था

विजय दिवस 16 दिसम्बर को 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत के कारण मनाया जाता है।

हरदोई : विजय दिवस 16 दिसम्बर को 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत के कारण मनाया जाता है। इस युद्ध के अंत के बाद 93,000 पाकिस्तानी सेना आत्मसमर्पण कर देती है।

साल 1971 के युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी, जिसके बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हो गया, जो आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. यह युद्ध भारत के लिए ऐतिहासिक और हर देशवासी के दिल में उमंग पैदा करने वाला साबित हुआ.

3 मई 1999 को शुरू होने वाला कारगिल युद्ध आज के ही दिन यानी 26 जुलाई 1999 को समाप्त हुआ था। इस युद्ध में भारतीय सेना के बहादुर जवानों ने सैकड़ों पाकिस्तानी सैनिकों को गोलियों से छलनी कर दिया था और जो बच गए थे वे दुम दबाकर भाग गए थे।

हालांकि अपनी वीरता का परिचय देते हुए कई भारतीय सैनिक शहीद हुए थे। शहीद सैनिकों में लांस नायक शहीद आबिद खान भी शामिल थे। शहीद आबिद हरदोई जिले के पाली कस्बे के निवासी थे। उनकी शहादत पर आज भी यहां का हर एक व्यक्ति फक्र करता है।

बचपन से ही सेना में भर्ती होने का था ख्वाब
पाली नगर के मोहल्ला काजीसराय में 6 मई 1972 को जन्मे आबिद खां बचपन से ही वीर थे। उनका सपना था कि वह सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा में अपना योगदान दे सकें।

5 फरवरी 1988 को उनकी यह ख्वाहिश भी पूरी हो गई। वह सेना में भर्ती हो गए। पिता गफ्फार खां और माता नत्थन बेगम के इस बेटे की शादी फ़िरदौस बेगम से हुई।

आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान अकेले मोर्चा लेने और घिर जाने पर वहां से बचकर सकुशल चौकी पर पहुँच जाने पर आबिद को 1995 में सेना मेडल से भी सम्मानित किया गया था।

4 साल बाद 1999 में कारगिल की जंग शुरू हो गई। आबिद बकरीद की छुट्टियों में घर आए हुए थे और तभी हेडक्वाटर से बुलावा आ गया। आबिद की पलटन को टाइगर हिल फतह करने भेजा गया।

17 पाक सैनिकों को मार गिराया था
30 जून को यह जत्था रावाना हुआ। दुश्मन की गोलाबारी के बीच कई सैनिक शहीद हो गए। एक गोली आबिद के पैर में भी आ लगी। उसके बाबजूद उन्होंने हिम्मत न हारते हुए आगे बढ़कर एक साथ 32 फायर झोंक दिए।

बेटों को है अब्बू की शहादत पर फक्र
शहीद आबिद के 24 साल के बेटे आदिल को अपने अब्बू की शहादत पर फक्र हैं। वह खुद भी सेना में जाकर देश की सेवा करना चाहता है। माँ फ़िरदौस भी अपने बेटे को फौजी बने देखना चाहती हैं।

फिलहाल वह सैनिक कोटा में आवंटित पेट्रोल पम्प का कार्य देखते हैं। साथ ही पढ़ाई भी कर रहे हैं। शहीद आबिद की बेटी चांदफरा (26) की शादी हो चुकी है। 22 साल की सबिस्ता और 20 साल की सगुप्ता को भी अपने अब्बू पर नाज है।

स्मारक की उपेक्षा
आबिद की शहादत पर पाली को नाज है, लेकिन जिस प्रकार शहीद स्मारक की उपेक्षा की जा रही है उससे शहीद परिवार ही नहीं, पाली की आवाम भी नाराज है। बरगद चौराहा के समीप बने शहीद स्मारक के पीछे घास फूस और झाड़ियां उगाई हैं, गंदगी का चारों ओर अंबार लगा हुआ है।

देश पर अपने प्राण न्योछावर करने वाले इस सपूत के स्मारक स्थल का सौंदर्यीकरण कराने तक की जिला प्रशासन ने जहमत नहीं उठाई। पूर्व सैनिक अहबाब खान शहीदों के प्रति इस उपेक्षा से खासे नाराज हैं।

नियमित नहीं आती पेंशन
शहीद आबिद के पिता गफ्फार खां को 5 हजार रुपये मासिक पेंशन मिलती है। लेकिन उन्हें इस बात का शिकवा हैं कि यह पेंशन हर माह नियमित रूप से नहीं आती।

कभी 6 माह तो कभी 9 माह बाद यह पेंशन मिलती हैं। शहीद आबिद का छोटे भाई खालिद सेना में भर्ती हो चुके हैं। हालांकि परिवारीजनों की मानें तो खालिद की नौकरी में सरकार की कोई भूमिका नहीं है, वह अपनी खुद की मेहनत से सेना में भर्ती हुए हैं।

शहीद के पिता गफ्फार खां ने अपने छोटे बेटे नासिर के लिए नौकरी की मांग की है।

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