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गुजरात, हिमाचल में पूरी तरह VVPAT से चुनाव

नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने आगामी गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावों को VVPAT मशीनों से कराने का फैसला किया है।

हालांकि निश्चित मतदान केंद्रों पर इनसे निकलने वाले पेपर वोट की अनिवार्य काउंटिंग नहीं होगी।

सूत्रों ने बताया कि चुनाव आयोग फिलहाल एक निश्चित प्रतिशत की वोटिंग वाले मतदान केंद्रों पर अनिवार्य VVPAT पेपर वोट की काउटिंग कराने के पक्ष में नहीं है और उसका ध्यान केवल नई व्यवस्था को ठीक तरीके से लागू कराने पर है।

इस साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव संभावित हैं। चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘हमें चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ने की जरूरत है।

गोवा में पहली बार इस्तेमाल के बाद गुजरात और हिमाचल के चुनाव बड़े राज्यों के ऐसे पहले चुनाव होंगे जहां शत प्रतिशत VVPAT आधारित वोटिंग होगी।’ उन्होंने बताया कि हर विधानसभा में मतदान केंद्रों की निश्चित संख्या पर पेपर ट्रेल की काउंटिंग से पहले इस नई व्यवस्था को ठीक तरीके से लागू कराना जरूरी है।

उम्मीदवार चाहे तो पेपर ट्रेल काउंटिंग करा सकता है

VVPAT मशीनें ईवीएम पर दर्ज हुए हर वोट का प्रिंटआउट देती हैं। किसी भी विवाद की स्थिति में इस पेपर ट्रेल का इस्तेमाल किया जा सकता है।

चुनाव आयोग के अधिकारी ने बताया कि काउंटिंग नियमों में पहले से ही ऐसी व्यवस्था है कि अगर कैंडिडेट रिजल्ट से संतुष्ट नहीं है, तो पेपर ट्रेल काउंट करा सकता है।

उन्होंने कहा कि गुजरात और हिमाचल के चुनावों में भी उम्मीदवार इस ऑप्शन का इस्तेमाल कर सकते हैं।

अधिकारी ने स्पष्ट करते हुए बताया कि गोवा में भी कुछ पोलिंग स्टेशनों पर VVPAT स्लिप की काउंटिंग की गई थी।

चुनाव आयोग की तरफ से अनिवार्य काउंटिंग की व्यवस्था नहीं होने के बावजूद चुनाव पर्यवेक्षक के पास अधिकार होगा कि ऐसे किसे निवेदन को स्वीकार करे।

इस साल मई में सर्वदलीय बैठक में चुनाव आयोग के सामने पेपर ट्रेल की अनिवार्य काउंटिंग का सुझाव आया था।

AAP समेत कुछ अन्य राजनीतिक दलों ने कहा था कि ऐसा होने से VVPAT पर भरोसा और बढ़ेगा। AAP ने हर विधानसभा के 25 फीसदी पोलिंग स्टेशनों पर पेपर स्लिप की अनिवार्य काउंटिंग की मांग की थी।

हालांकि चुनाव आयोग ने इसे 5 फीसदी घटाने की बात कही थी। इसके अलावा यह भी सुनिश्चित करने की बात हुई थी कि अनिवार्य काउंटिंग वाली विधानसभाओं में 5 से कम या 14 से अधिक पोलिंग स्टेशनों पर पेपर ट्रेल की गिनती न हो।

हालांकि बाद में यह बात सामने आई कि कम पोलिंग स्टेशनों पर भी अनिवार्य पेपर ट्रेल काउंटिंग से रिजल्ट कम से कम 3 घंटे देर हो सकता है।

इसके अलावा बड़ी विधानसभाओं में इसे लागू करने की अलग ही चुनौतियां हैं। ऐसे में चुनाव आयोग ने फ्रेमवर्क बनाने के लिए एक आंतरिक कमिटी का गठन किया था।

अभी तक कमिटी ने अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपी है।

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