मध्यप्रदेश

दिव्यांगों में दूसरों के बराबर जीने का जज्बा, कमजोरी को बनाया हथियार

शासन की सहायता के भरोसे नहीं बैठते हुए शारीरिक कमजोरी को हरा दिया। 23 साल की उम्र में संतोष टेलर बन गया।

मंदसौर की माटी की खासियत कहें या दिव्यांगों में दूसरों के बराबर जीने का जज्बा उन्होंने शारीरिक कमजोरी को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है।

ठीक से चल नहीं पाने के बाद भी दुनिया के साथ दौड़ रहे हैं। वे किसी ह्रष्ट-पुष्ट और तंदुरस्त व्यक्ति की भांति ही काम करते हैं। विश्व दिव्यांग कल्याण दिवस पर नईदुनिया ने कुछ ऐसे ही दिव्यांगों से चर्चा की।

नृसिंहपुरा का निवासी 36 वर्षीय संतोष कुराड़िया दोनों पैरों से दिव्यांग है। पांच साल की उम्र में बीमारी के बाद से उसके दोनों पैरों ने काम करना बंद कर दिया था।

ईश्वर की मर्जी से नाराज होने के बजाय संतोष ने अपने नाम की भांति जीवन में संतोष रखा और आगे बढ़ता गया। 8वीं तक पढ़ाई भी की और इसी बीच मंदसौर में ही एक दुकान पर टेलरिंग का काम भी सीख लिया।

शासन की सहायता के भरोसे नहीं बैठते हुए शारीरिक कमजोरी को हरा दिया। 23 साल की उम्र में संतोष टेलर बन गया।

नृसिंहपुरा में ही स्वयं की दुकान खोल ली और अब 12 साल से वह टेलरिंग कर रहा है। संतोष अब तक छह लोगों को टेलरिंग का काम भी सीखा चुका है और दीपावली और अन्य सीजन के समय वह चार कर्मचारियों को रोजगार भी देता है। संतोष ने बताया कि पेंशन के 300 रुपए से घर चलाना मुश्किल था।

मैं तो टेलरिंग का कार्य करके छह हजार रूपए महीने के कमा लेता हूं। वहअपने पैरों से मशीन चलाकर फर्राटे से कपड़े भी सी लेता है। नृसिंहपुरा के अधिकांश लोग उसी की दुकान पर आते है।

सुबह दुकानदार, दोपहर बाद किसान बन जाता है जगदीश

बादरपुरा में हृष्ट-पुष्ट किसान की तरह दिव्यांग जगदीश ओस्तवाल भी खेती करता है। 38 वर्षीय जगदीश का एक पैर बचपन से ही पोलियोग्रस्त है। उसने दिव्यांगता को कभी हावी नहीं होने दिया हैं।

वह रोज सुबह पांच बजे उठ जाता है। नृसिंहपुरा से एक किमी दूर बादरपुरा खेत पर पहुंचकर सब्जियों की पोटली को तीन पहिए की साइकिल पर रख जीवागंज की सब्जी मंडी में दुुकान लगाता है। यहां से फ्री होते ही ट्रायसाइकिल से खेत पर पहुंचकर सब्जियों की तोड़ने, पानी पिलाने और खाद देने में व्यस्त रहता है।

सीजन की ऐसी एक भी सब्जी नहीं जो जगदीश के खेत में नहीं मिलती है। एक पैर से चलने में दिक्कत होने के बाद भी जगदीश की मेहनत पर फर्क नहीं पड़ता है।

वह अच्छा किसान होने के साथ ही जूट से घरेलू आयटम बनाने का मास्टर ट्रेनर भी है। अब तक 150 लोगों को जूट शिल्प का कार्य सिखा भी चुका है। ये सभी लोग अपने-अपने क्षेत्र में अच्छी कमाई कर रहे हैं।

जगदीश कहता है कि दिव्यांगता मुझे न तो हरा पाई और न ही आगे कभी हरा पाएगी। मुझमें शारीरिक कमजोरी है लेकिन न तो कभी महसूस करता हूं और न ही कभी करूंगा।

सब्जियों की खेती से लगभग 200 रुपए रोज कमा लेता हूं इससे मेरे सपने पूरे होेते हैं। अब इतना ही इंतजार है कि शासन मुझे कही जूट शिल्प का कार्य दे दे।

 

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