उपाय कौन से हैं? उपायों से जीवन को कैसे सहज बना सकते हैं?

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव

स्तुति

स्तोत्रम एवं स्तुति दोनों का उद्भव एक ही क्रिया ‘स्तु’ से हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ है प्रसंशा करना। सामान्य रूप में स्तुति स्तोत्रम् का ही छोटा रूप है।

पंचांग

किसी विशेष देवी देवता की पूजा हेतु पांच आवश्यक अंगों के समूह को पंचांग की संज्ञा दी गयी है। ये हैं-
1. पटाला मंत्र जिसे कोड के रूप में अंकित किया गया है तथा ये साधना हेतु बनी मूर्ति का वर्णन करते हैं।
2. पद्धति आवरणों अर्थात देवताओं के सेवकों की पूजा के रिवाज।
3. कवच अशुभत्व दूर करने हेतु सामान्यतः शरीर पर पहना जाता है।
4. सहस्रनाम एक हजार नामों का जाप
5. स्तुति साधक के इष्टदेवता को प्रसन्न करने हेतु ऋचाएं

सूक्त

सूक्त, स्तोत्र एवं स्तुति शब्द समानार्थक हैं जिनका तात्पर्य होता है प्रशंसा करना। सूक्त वेदों के अंग हैं। किंतु स्तोत्र एवं स्तुति वदों से संबंधित नहीं हैं। सामान्यतः स्तुति स्तोत्र का ही छोटा रूप है।

स्तोत्र

स्तोत्र एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है- कसीदा, स्तवन अथवा प्रशंसनात्मक ऋचाएं, स्तोत्र प्रार्थना के रूप में अथवा वर्णनात्मक अथवा बातचीत के रूप में हो सकता है किंतु इसकी संरचना काव्यात्मक ही होती है। यह सामान्य कविता हो सकती है जिसमें किसी देवी अथवा देवता की प्रसंशा की गयी हो अथवा उनके प्रति व्यक्तिगत भक्ति को प्रदर्शित किया गया हो। अनेक स्तोत्र की ऋचाएं देवी, शिव अथवा विष्णु के विभिन्न पहलुओं की प्रशंसा हेतु सृजित हैं।

सुप्रभातम

ईश्वर को जगाने हेतु आहवान करना सुप्रभातम कहलाता है। सामान्यतः यह एक छोटी स्तुति के रूप में होती है जिसे अहले सुबह गाया जाता है।

अष्टकम एवं चालीसा

अष्टकम एवं चालीसा में निश्चित संख्या में दोहे होते हैं। अष्टकम में आठ श्लोक होते हैं किंतु चालीसा प्रमुखतः हिन्दी प्रार्थना है तथा इसमें चालीस दोहे होते हैं।

ध्यानम् एवं अर्चनम्

ध्यानम् एवं अर्चनम् प्रार्थना नहीं हैं, ये पूजा के प्रकार हैं। ध्यानम् का तात्पर्य साधना एवं अर्चनम का अर्थ पूजा करना होता है जैसा कि शास्त्रों में उल्लेख है। लक्ष्मी ध्यानम अथवा देवी अर्चनम में देवी लक्ष्मी से संबंधित प्रार्थनाओं एवं पूजा पद्धति के समुह हैं जिनका उपयोग आप साधना के वक्त अथवा देवी लक्ष्मी की पूजा के वक्त कर सकते हैं।

प्रार्थना

प्रार्थना एक ऐसा कृत्य है जिसमें पूजा की वस्तु का जबर्दस्ती संवाद के द्वारा आहवान किया जाता है। प्रार्थना व्यक्तिगत अथवा सामुहिक हो सकता है तथा इन्हें सार्वजनिक स्थल पर अथवा निजी स्थान पर आयोजित किया जा सकता है। इसमें शब्दों, गानों को समाविष्ट किया जा सकता है अथवा प्रार्थना बिल्कुल मौन रखकर भी किया जा सकता है। प्रार्थना किसी देवी देवता भूत-प्रेत, मृत व्यक्ति आदि को निर्दिष्ट किये जा सकते हैं जिसका उद्देश्य उनकी पूजा करना, निर्देश के लिए अनुरोध करना, उनकी सहायता हेतु विनय करना अथवा उनसे अपने द्वारा किये गये अपराध हेतु अपने विचार एव भावनाओं का प्रदर्शन कर क्षमा प्रार्थना करना है।

माला

मालाओं का प्रयोग विभिन्न मंत्रोच्चारण करने के लिए किया जाता है।

स्फटिक

स्फटिक हमारी प्रतिकूल उर्जा से रक्षा करते हैं। यह प्रकाश और ऊर्जा का एक शक्तिशाली माध्यम है। यह परिवर्तक व विस्तारक / वर्द्धक के रूप में विभिन्न ऊर्जाओं को जैव ऊर्जाओं में परिवर्तित
करके हमारे शरीर तंत्र / शारीरिक संरचना को संतुलित करते हैं व कोशिकीय, भावनात्मक, मस्तिष्कीय व आध्यात्मिक स्तर पर पुनः ऊर्जावान् बनाते हैं।

शंख

पुराणों में शंख को ऊं का प्रतीक माना गया है इसलिए पूजा-अर्चना व मांगलिक कार्यों पर शंख ध्वनि की विशेष महता है। शंख के ऊर्जा चक्र व ध्वनि के प्रभाव से ईश्वर ध्यान में पुजारी को सर्प इत्यादि खतरनाक जीव बाधा नहीं पहुंचाते तथा बुरी आत्माएं दूर भागती हैं साथ ही इसके अनेक सौभाग्यदायक, अनिष्ट शमन कारक व औषधीय गुण लोक प्रसिद्ध हैं। भारतीय वैज्ञानिकों के अनुसार शंख ध्वनि कंपनों से वातावरण में रहने वाले सभी कीटाणु पूर्णतया नष्ट हो जाते हैं तथा प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग से बचाव हो सकता है व ओजोन लेयर के सुराख भर सकते हैं। शंख बजाने से बजाने वाले के अंदर साहस, दृढ़ इच्छा शक्ति, आशा व शिक्षा जैसे गुणों का संचार होता है तथा श्वांस रोग, अस्थमा व फेफड़ों के रोगों में आराम मिलता है।

पारद शिवलिंग

पारद् शिवलिंग की पूजा करके हमें शिवजी का आशीर्वाद तुरंत प्राप्त होता है क्योंकि पारद शिवलिंग की पूजा से हजार करोड़ शिवलिंगों की पूजा का फल प्राप्त होता है। शिव पुराण में पारे को शिव का पौरुष कहा गया है। इसके दर्शन मात्र से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि शास्त्रों में इसे अत्यंत महत्व दिया गया है।

अंगूठी

यह माना जाता है कि अंगूठियों का हमारे ऊपर रहस्यमयी प्रभाव होता है। जब रत्न हमारी उंगली को स्पर्श करता है तो हमारे अंदर अनुकूल ऊर्जा का प्रवाह करता है जिसका सीधा प्रभाव हमारे मस्तिष्क पर होता है चूंकि हमारी उंगलियों की स्नायु का संबंध सीधे मस्तिष्क से होता है।

पिरामिड

पिरामिड उपयुक्त स्थान पर स्थापित करने से, भूमि व भवन के ऊर्जा क्षेत्र को सकारात्मक (बलशाली व जैव-ऊर्जा में परिवर्तित करता है और व्यक्ति की जैव-ऊर्जा को खाली करने के बजाय संपूर्ण करता है। अतः वह व्यक्ति थकान व तनाव न महसूस करते हुए अतिरिक्त ऊर्जावान होकर रोजमर्रा की जिंदगी के दबावों व अपेक्षाओं का डटकर सामना कर पाता है। सकारात्मक ऊर्जा स्रोत के अंतर्गत व्यक्ति बेहतर निद्रा व स्वस्थ एवं सतुंष्ट जीवन को प्राप्त करता है। ऐसे में व्यक्ति अधिक अच्छे से ध्यान लगा सकता है तथा उसकी तनाव, थकान व संक्रामक रोगों से मुक्ति हो जाती है।

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