आखिर लॉकडाउन से हमें क्या हासिल हुआ? ज़रा सोचिए – प्रकाशपुंज पांडेय

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने लॉकडाउन को लेकर खड़े किए सवाल

रायपुर: समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने मीडिया के माध्यम से समाज के समक्ष कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण हुए देशव्यापी लॉकडाउन और फिर बार – बार राज्य और जिला स्तर पर लॉकडाउन को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए देश और छत्तीसगढ़ प्रदेश की जनता, शासन और प्रशासन से प्रश्न किया है कि आखिरकार देश, प्रदेश और जिला स्तर पर बारम्बार लॉकडाउन लगाने से क्या लाभ प्राप्त हुआ? यह एक ऐसा प्रश्न है जो सभी के मन में है और जिसका उत्तर शायद ही किसी के पास होगा। सरकारों की दलील है कि कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण फैले वैश्विक स्तर के संक्रमण को रोकने के लिए यह एक जरूरी कदम है ताकि संक्रमण की कड़ी को तोड़ा जा सके।

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने कहा कि अगर मान भी लिया जाय कि सरकारों का लॉकडाउन को लेकर जो तर्क है वो सही है, तो भी एक बड़ा प्रश्न उठता है कि जब देश में कोरोना वायरस के 400 पॉजिटिव केस थे तो सम्पूर्ण लॉकडाउन लगा दिया गया और जब यह आंकड़ा लाखों की संख्या में पहुंच गया तो लॉकडाउन को अनलॉक कर दिया गया। छत्तीसगढ़ में जब ये आंकड़े नियंत्रण में थे तो लॉकडाउन हटा कर शराब की दुकानें खोल दी गईं जो कि छत्तीसगढ़ में कोरोना वायरस के विस्तार की सबसे बड़ी वजह साबित हुई।

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने सवाल उठाया कि क्या लॉकडाउन का पालन करने की ज़िम्मेदारी केवल जनता की ही है? क्योंकि लॉकडाउन के पहले और बाद में भी जो हरकतें कुछ राजनेताओं की थीं वो किसी से छुपा नहीं है, फिर चाहे वो लॉकडाउन के पहले शाहीन बाग, दिल्ली दंगे, नमस्ते ट्रम्प, मध्य प्रदेश की चुनी हुई सरकार को गिराना हो या फिर लॉकडाउन के बाद योगी आदित्यनाथ का अयोध्या गमन, देश के विभिन्न हिस्सों में राजनेताओं द्वारा आयोजित कार्यक्रम, जन्म दिवस, शादी समारोह, उद्घाटन समारोह आदि। आखिर आम और खास लोगों में कानूनी रूप से भेद-भाव क्यों? हमने तो सुना था कि कानून अंधा होता है और वह सबके लिए समान है?

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने सवाल उठाया है कि लॉकडाउन के कारण जनता को होने वाली परेशानियों का भुगतान कौन करेगा? काम धंधे, बाजार व्यापार और रोज़गार सब लॉकडाउन में बंद कर दिए जाते हैं लेकिन जनता के रोज़मर्रा के खर्चे तो बंद नहीं होते। घर का राशन, बिजली के बिल, नगर निगम के टैक्स, बच्चों की स्कूल फीस जैसे जरूरी खर्च तो बंद नहीं हुए। हाँ लोगों की आय ज़रुर बंद हो गई। लेकिन ऐसा कैसे मुमकिन है कि संपूर्ण लॉकडाउन के बाद भी छत्तीसगढ़ में शराब खुलेआम बिक रही है, कालाबाजारी अपनी चरम सीमा पर है, बढ़ी कीमतें पर सब्ज़ियां बिक रही हैं, कई दुकानों में अवैध रूप से सामान बिक रहा है, कुछ बार और रेस्त्रां में अवैध रूप से शराब परोसी जा रही है, लॉकडाउन में अपराध भी नहीं रुके, पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। लेकिन कोरोना पॉजिटिव मरीज़ों के आंकड़ों में यथावत बढ़ोत्तरी हो रही है।

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने अंत में कहा कि लॉकडाउन का फैसला सरकार का है, जनता का नहीं। तो इसका खामियाज़ा जनता क्यों भुगते? मेरा सुझाव है कि जैसा कांग्रेस पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी ने कहा था कि लॉकडाउन कोरोना का उपाय नहीं है, इसके लिए सरकार को जनता को जागरूक करने का अभियान चलाना चाहिए। क्योंकि कोरोना वायरस से डरने की जरूरत नहीं है, बल्कि इससे समझदारी से, आत्मविश्वास से और सतर्क होकर लड़ने की जरूरत है और जब तक कोरोना का वैक्सीन हमारे पास नहीं आ जाता तब तक हमें सावधानीपूर्वक रहना है। लेकिन लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से हाउस अरेस्ट करके सरकार को कुछ हासिल नहीं होगा, उल्टा इससे सरकार की छवि खराब हो रही है।

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