जब अटलजी ने कहा था … ‘मुझे लगा कि डॉ. मुखर्जी के काम को आगे बढ़ाना चाहिए.

पत्रकारिता से राजनीति तक का सफर

मनीष शर्मा

मुंगेली : देश के महानतम प्रधानमंत्रियों में से एक और महान राजनेता, कवि अटल बिहारी वाजपेयी एक अच्छे पत्रकार भी थे. असल में, अपने करियर के शुरुआती दौर में वे और बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी दोनों पत्रकार थे.

एक स्कूल शिक्षक परिवार में जन्मे अटलबिहारी वाजपेयी के लिए जीवन का शुरुआती सफर आसान नहीं था. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया ( अब लक्ष्मीबाई ) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई थी.

उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरू किया. उन्होंने राष्ट्रधर्म, पॉन्चजन्य और वीर अर्जुन जैसे अखबारों-पत्रिकाओं का संपादन किया.

वे बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे और इस संगठन की विचारधारा (राष्ट्रवाद या दक्षिणपंथ) के असर से ही उनमें देश के प्रति कुछ करने, सामाजिक कार्य करने की भावना मजबूत हुई.

इसके लिए उन्हें पत्रकारिता एक बेहतर रास्ता समझ में आया और वे पत्रकार बन गए.उनके पत्रकार से राजनेता बनने का जो जीवन में मोड़ आया, वह एक महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा है. इसके बारे में खुद अटल बिहारी ने वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह को एक इंटरव्यू में बताया था.

खुद अटलजी ने बताई प्रेरणा…

इस इंटरव्यू में अटल जी ने बताया था कि वे बतौर पत्रकारिता अपना काम बखूबी कर रहे थे. 1953 की बात है, भारतीय जनसंघ के नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर को विशेष दर्जा देने के खिलाफ थे.

जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट सिस्टम का विरोध करने के लिए डॉ. मुखर्जी श्रीनगर चले गए. परमिट सिस्टम के मुताबिक किसी भी भारतीय को जम्मू-कश्मीर राज्य में बसने की इजाजत नहीं थी. यही नहीं, दूसरे राज्य के किसी भी व्यक्ति को जम्मू-कश्मीर में जाने के लिए अपने साथ एक पहचान पत्र लेकर जाना अनिवार्य था.

डॉ. मुखर्जी इसका विरोध कर रहे थे. वे परमिट सिस्टम को तोड़कर श्रीनगर पहुंच गए थे. इस घटना को एक पत्रकार के रूप में कवर करने के लिए वाजपेयी भी उनके साथ गए. वाजपेयी इंटरव्यू में बताते हैं, ‘पत्रकार के रूप में मैं उनके साथ था.

वे गिरफ्तार कर लिए गए. लेकिन हम लोग वापस आ गए. डॉ. मुखर्जी ने मुझसे कहा कि वाजपेयी जाओ और दुनिया को बता दो कि मैं कश्मीर में आ गया हूं, बिना किसी परमिट के.’ इस घटना के कुछ दिनों बाद ही नजरबंदी में रहने वाले डॉ. मुखर्जी की बीमारी की वजह से मौत हो गई.

इस घटना से वाजपेयी काफी आहत हुए. वह इंटरव्यू में कहते हैं, ‘मुझे लगा कि डॉ. मुखर्जी के काम को आगे बढ़ाना चाहिए.’ इसके बाद वाजपेयी राजनीति में आ गए. वह साल 1957 में वह पहली बार सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे.

छत्तीसगढ़ से से रहा गहरा लगाव, अनेकों सौगाते दी…

राजनीति के अजातशत्रु भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी का छत्तीसगढ से गहरा नाता है। गर हम यूँ कहें कि अगर अटल ना होते तो छत्तीसगढ ही ना होता तो ना कोई अतिशयोक्ति है ना ज़रा सी भ्रामक बात। यह अटल बिहारी बाजपेयी ही थे

जिन्होंने वर्षों के संघर्ष को सम्मान दिया और छत्तीसगढ के रुप में भारत के नक़्शे में नया राज्य अस्तित्व में आया। यह अटल बिहारी जी ही थे जिन्होंने छत्तीसगढ को राज्य के रुप में स्थापित किया और उसे मंज़ूरी दिलाई।

उनका लगाव छत्तीसगढ से लगातार बना रहा, बतौर प्रधानमंत्री अटल जी सबसे ज्यादा वक़्त छत्तीसगढ में रुके,तीन दिन दो रात वे छत्तीसगढ भवन में रुके थे। अटल जी ने बिलासपुर को रेलवे ज़ोन दिया और उसको लोकार्पित भी उन्होंने ही किया।

सीपत एनटीपीसी को भी देश को उन्होने समर्पित किया। राज्य को एम्स के रुप में स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण सौग़ात भी उन्होने दी। अटल जी इस समय एम्स में है,उनके जीवन को लेकर तमाम शंकाएँ समूचे भारत को बेचैन कर रही हैं,

अब से कुछ देर पहले जारी मेडिकल बुलेटिन अगर राहत नही देता तो कम से कम आशा को बनाए जरुर रखता है। छत्तीसगढ के लिए अटल जी की भुमिका और उनके कार्य कभी नही भूलने वाले हैं,

पृथक छत्तीसगढ राज्य के रुप में इस धरती को सम्मान देने वाले अटल जी के प्रति छत्तीसगढ भावनाओं से सराबोर है, बेहद भावुक है। बीते नौ बरसो से सार्वजनिक जीवन से दूर भारत रत्न अटल ज़ी कवि है,

उनकी कविता की यह पंक्तियाँ इस उम्मीद के साथ छत्तीसगढ आज उन्ही के लिए गुनगुना रहा है कि “काल के कपाल पर वे खुद को विजयी लिख कर फिर मार्गदर्शन के लिए लौट आएँ। हार नहीं मानूँगा… काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ.. हार नही मानूँगा ..”

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