कब है शरद पूर्णिमा ? कैसे रखें व्रत (शरद पूर्णिमा व्रत – अक्टूबर 2019 )

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव:

(मनोकामना सिद्धि के लिए)
माहात्म्य

शरद पूर्णिमा के विषय में विख्यात है, कि इस दिन कोई व्यक्ति यदि कोई अनुष्ठान करता है तो उसका अनुष्ठान अवश्य सफल होता है। तीसरे पहर इस दिन व्रत कर हाथियों की आरती करने पर उत्तम फल मिलते है।

इस दिन के संदर्भ में एक मान्यता प्रसिद्ध है, कि इस दिन भगवान श्री कृ्ष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचा था। इस दिन चन्द्रमा कि किरणों से अमृत वर्षा होने की किवदंती प्रसिद्ध है। इसी कारण इस दिन खीर बनाकर रात भर चांदनी में रखकर अगले दिन प्रातः काल में खाने का विधि-विधान है।

आश्विन मास कि पूर्णिमा सबसे श्रेष्ठ मानी गई है। इस पूर्णिमा को आरोग्य हेतु फलदायक माना जाता है। मान्यता अनुसार पूर्ण चंद्रमा अमृत का स्रोत है अतः माना जाता है कि इस पूर्णिमा को चंद्रमा से अमृत की वर्षा होती है। शरद पूर्णिमा की रात्रि समय खीर को चंद्रमा कि चांदनी में रखकर उसे प्रसाद-स्वरूप ग्रहण किया जाता है।

मान्यता अनुसार चंद्रमा की किरणों से अमृत वर्षा भोजन में समाहित हो जाती हैं जिसका सेवन करने से सभी प्रकार की बीमारियां आदि दूर हो जाती हैं। आयुर्वेद के ग्रंथों में भी इसकी चांदनी के औषधीय महत्व का वर्णन मिलता है। खीर को चांदनी में रखकर अगले दिन इसका सेवन करने से असाध्य रोगों से मुक्ति प्राप्त होती है।

पूजन विधि-विधान

शरद पूर्णिमा का पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत होकर अपने अराध्य, कुल देवता की षोडशोपचार से पूजा अर्चना एवं शंकर भगवान के पुत्र कार्तिकेय की भी पूजा इस करने का विधान है।

एक पाटे पर जल से भरा लोटा और गेंहू से भरा एक गिलास रखकर उस पर रोली से स्वास्तिक बनाकर चावल और दक्षिणा चढ़ाएं। फिर टीका लगाकर हाथ में गेंहू के 13 दाने हाथ में लेकर कहानी सुनी जाती है।

उसके पश्चात गेंहू भरे गिलास और रुपया कथा कहने वाली स्त्रियों को पैर छूकर दिये जाते है। लोटे के जल और गेंहू का रात को चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए और इसके बाद ही भोजन करना चाहिए। मंदिर में खीर आदि दान करने का विधि-विधान है।

विशेष रुप से इस दिन तरबूज के दो टुकड़े करके रखे जाते हैं। साथ ही कोई भी एक ऋतु का फल रखा और खीर चन्द्रमा की चांदनी में रखा जाता है। ऐसा कहा जाता है, कि इस दिन चांद की चांदनी से अमृत बरसता है। अर्द्धरात्रि को अपने अराध्य को अर्पण कर सभी को प्रसाद बांट देना चाहिए। रात में जागरण करके भजन कीर्तन करना चाहिए।

व्रत कथा

आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला त्यौहार शरद पूर्णिमा की कथा कुछ इस प्रकार से है – एक साहूकार के दो पुत्रियां थी। दोनों पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थी, परन्तु बड़ी पुत्री विधिपूर्वक पूरा व्रत करती थी जबकि छोटी पुत्री अधूरा व्रत ही किया करती थी।

परिणामस्वरूप साहूकार के छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी। उसने पंडितों से अपने संतानों के मरने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि पहले समय में तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत किया करती थी, जिस कारणवश तुम्हारी सभी संतानें पैदा होते ही मर जाती है।

फिर छोटी पुत्री ने पंडितों से इसका उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि यदि तुम विधिपूर्वक पूर्णिमा का व्रत करोगी, तब तुम्हारे संतान जीवित रह सकते हैं। यह जानकर उसके पूर्ण विधि-विधान से शरद पूर्णिमा का व्रत किया और उसकी कामना पूर्ण हुई।

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