सरकारी सिलेंडर तो दे दिया, साहब गैस कहां से भरवाएं

राज शार्दुल

कोंडागांव।

स्कूल में अध्ययनरत मासूम बच्चियों को जंगल से लकड़ी के गट्ठे का भारी-भरकम वजन को 2 से 3 किलोमीटर तक ले जाना किसी दंड से कम नहीं है। दौड़ने के अंदाज में चल रही थी। बच्चियां जिससे पसीने से तरबतर हो गई थी, किंतु उनकी किस्मत में आराम कहां उन्हें तो लम्बी दूरी तय कर घर पहुचना है ।स्कूल यूनिफॉर्म को देख कर लग रहा है कि यह बच्चियां किसी छात्रावास में ईंधन के लिए लकड़ी ले जा रही हैं किंतु लाख कोशिश के बावजूद भी लड़कियों ने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया, बल्कि वह दौड़ती रही।

तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी कि आदिवासी क्षेत्र में विकास की किरणें कहां तक पहुंच रही हैं. उज्जवला योजना का लाभ महिलाओं को कितना मिल रहा है. 200 में उज्जवला योजना का कनेक्शन तो मिल रहा है किंतु एक बार गैस रिफिलिंग चार्ज 900 से भी अधिक हो गया है।

जहां लोगों को मुफ्त में ईंधन के लिए लकड़ी मिल रही है वहां गरीब के लिए 900 का जुगाड़ कर पाना इतना आसान नहीं है गैस रिफिलिंग की सब्सिडी खाते में कब आएगी और अनपढ़ गरीब आदमी को इसकी जानकारी कौन देगा।

अच्छे अच्छे लोगों को अपने खाते की राशि जानने के लिए बैंक का चक्कर लगाना पड़ता है ऐसे में इन गरीबों को कामकाज छोड़कर बैंक का चक्कर लगाना संभव दिखाई नहीं देता शायद उज्जवला योजना का लाभ 200 कनेक्शन के समय तो ठीक है लेकिन 900 से अधिक में रिफिलिंग कराना गरीबों के बस का बात नहीं है।

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