दो टूक ( श्याम वेताल ) : एंटी बीजेपी अम्ब्रेला बना तो डंडी कौन थामेगा ?

श्याम वेताल
             श्याम वेताल

कर्नाटक में हुए नाटकीय घटनाक्रम के बाद देश की राजनीति में विपक्षी एकता की चर्चा शुरूहो गयी है. इस चर्चा के पीछे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की वह प्रेस कॉन्फ्रेंस रही है जो उन्होंने कर्नाटक के मुख्यमंत्री यदुयुरप्पा के इस्तीफे के बाद दिल्ली में की थी. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने कहा था कि आगे आने वाले चुनाव में भी विपक्षी दलों को एकजुट होकर लड़ना होगा और भाजपा एवं नरेंद्र मोदी सरकार को शिकस्त देनी होगी .हालांकि प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने विपक्षी एकता पर बहुत जोर नहीं दिया था लेकिन मीडिया ने राहुल के मुंह से निकले शब्दों का बेहतरीन कैच लिया और इसे वायरल कर दिया . अब स्थिति यह है कि पूरा देश विपक्षी एकता पर चर्चा, बहस, फायदा, नुकसान पर अपनी राय आम कर रहा है.

कांग्रेस यदि यह समझती है कि कर्नाटक में कांग्रेस को सत्ता का हिस्सा मिलने के पीछे विपक्षी की एकता है तो बिल्कुल गलत है. जनता दल सेक्युलर जे डी एस के साथ कांग्रेस ने चुनाव परिणाम आने के बाद समझौता किया है यह कोई एकता नहीं है यह तात्कालिक समझौता है. कांग्रेस और जे डी एस ने कर्नाटक में एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा था और एक दूसरे के प्रति काफी विष- वमन किया था .अब सरकार गठन के लिए फॉर्मूला वन रहा है. फार्मूला कोई भी बने, टिकाऊ नहीं रह सकेगा. यदि इन दोनों दलों ने चुनाव पूर्व कोई ऐसा समझौता किया होता तो स्थाई सरकार की कल्पना की जा सकती थी. दोनों दलों के बीच यदि यह समझौता मधुर होता तो जे डी एस प्रमुख कुमार स्वामी ने यह शर्त क्यों रखी कि मुख्यमंत्री जे डी एस का होगा.

आम तौर पर जब भी ऐसा कोई समझौता होता है तो जिस दल के विधायक अधिक होते हैं मुख्यमंत्री उसी दल का होता है .अब आपको बिहार याद आ रहा होगा लेकिन बिहार में परिस्थितियां अलग थी वहां चुनाव पूर्व राजद और जेडीयू के बीच संधि हुई थी और मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार को प्रोजेक्ट किया गया था . ऐसा दोनों दलों के चुनाव पूर्व की सहमति के तहत हुआ था इसलिए चुनाव के बाद जेडीयू के विधायकों की संख्या राजद से कम होने के बावजूद नीतीश मुख्यमंत्री बने.

अब इस स्थिति को देखते हुए विपक्षी एकता का केंद्र कर्नाटक घटनाक्रम को नहीं माना जा सकता है . हां , कांग्रेस को यदि ऐसा लगता है कि 2019 का चुनाव वह अकेले लड़ कर भाजपा को नहीं हरा सकती तो उसे विपक्षी एकता के विकल्प पर काम करना चाहिए.कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को एक छाते के नीचे आना चाहिए. यदि एंटी बीजेपी अंब्रेला बन भी गया तो इस छाते की डंडी कौन थामेगा, इस पर विचार होना चाहिए.

क्या राहुल गांधी को छाते की डंडी थमाने को अन्य विपक्षी दल तैयार होंगे ? जब तक इस सवाल का जवाब नहीं आएगा विपक्षी दलों के बीच एकता होना संभव नहीं हो सकेगा.
राहुल गांधी के बजाय सोनिया गांधी यदि आगे आकर इस छाते की डंडी थामने को तैयार हो जाए और उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जाय तो शायद विरोध पक्ष के कई दल एंटी बीजेपी अम्ब्रेला के नीचे आ सकते हैं.

बंगलुरु में कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण के अवसर पर कई सारे विपक्षी नेता एक मंच पर एकत्रित हुए. इनमें सोनिया गांधी, मायावती, ममता बनर्जी, शरद पवार, शरद यादव, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, हेमंत सोरेन, चंद्रबाबू नायडू, सीताराम येचुरी, अजीत सिंह और डी. राजा की मौजूदगी खास रही. इन नेताओं ने एक दूसरे से हाथ मिलाकर फोटो भी खिंचवाए लेकिन फिर प्रश्न उठता है कि सिर्फ हाथ ही मिले हैं या दिल भी मिले हैं. बंगलुरु की धरा पर एकजुट दिखने वाले ये नेता दिल्ली पहुंचकर किस सुर में बात करेंगे, कहा नहीं जा सकता है. इनमें से कई नेताओं के मन में कुछ मस्तिष्क में कुछ और चल रहा होगा आखिर प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश किस नेता में नहीं होगी ?

जहां तक विपक्षी एकता का प्रश्न है कई क्षेत्रीय दल है जो भाजपा के दुश्मन है लेकिन वह कांग्रेस के भी मित्र नहीं हैं. जैसे कर्नाटक में जे डी एस. बंगाल में ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू, उत्तर प्रदेश में मायावती जैसे लोगों को राहुल का नेतृत्व स्वीकार होगा ? आज की परिस्थिति में कल्पना भी नहीं की जा सकती है. चुनाव के बाद जिस पार्टी की सीट सबसे ज्यादा आएगी नेता उसी पार्टी का होगा – इस आधार पर क्षेत्रीय दल एक छाते के नीचे शायद ना आ पाए क्योंकि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है तो सीटें उसी की ज्यादा होंगी इसलिए नेता भी कांग्रेस का ही होगा. यह फॉर्मूला कई दलों को रास नहीं आएगा. इसलिए आज की तारीख में भाजपा और मोदी को किनारे लगाने के लिए विपक्षी एकता का कोई सर्वमान्य मार्ग स्पष्ट नहीं है.

इसके अतिरिक्त यह भी प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के आगे झुक सकती है.कर्नाटक जैसी स्थिति आम चुनाव में शायद नहीं बन सकेगी. इससे कांग्रेस की प्रतिष्ठा पर आंच आएगी इसके बाद भी यदि येन-केन-प्रकारेण विपक्ष में एका हो भी जाता है और वह भाजपा को सत्ता से बेदखल करने में सफल हो जाते हैं तो जो सरकार बनेगी, क्या वह स्थिर होगी ? क्या उस सरकार में अटल बिहारी वाजपेई जैसा कोई नेता होगा जो दर्जन से अधिक दलों के बीच सामंजस्य बना सके ?

अंततः निष्कर्ष यही निकलेगा कि विपक्षी एकता की बातें आज की तारीख में हवा- हवाई हैं. कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी ही भाजपा से मोर्चा ले सकती है. कांग्रेस को अपना संगठन और मजबूत करना होगा और कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को जनता के बीच जाना होगा. कांग्रेस के लोग अभी से वोटर के बीच जाकर भाजपा सरकार की खामियां बताएं तो बात बन सकती है. एक बात और – राहुल गांधी सिर्फ नरेंद्र मोदी को निशाने पर न रखें, पूरी भाजपा के खिलाफ उन्हें बोलना चाहिए. नरेंद्र मोदी ही भाजपा नहीं है. कांग्रेस को अकेले नरेंद्र मोदी से नहीं बल्कि भाजपा से लड़ना है.

new jindal advt tree advt
Back to top button