भगवान की परिक्रमा क्यों की जाती है ?

भगवान की मूर्ति और देवालय के दाहिने हाथ की ओर से शुरु कर उनके चारों ओर घूमना ही ‘परिक्रमा’ या ‘प्रदक्षिणा’ करना कहलाता है । जिस प्रकार भगवान के चरणों से स्पर्श किया हुआ जल ‘चरणामृत’ बन जाता है, भगवान को निवेदित किया गया भोजन ‘प्रसाद’ बन जाता है; उसी प्रकार भगवान की मूर्ति या किसी सत्वगुणी पदार्थ की दाहिनी दिशा से की गयी परिक्रमा से मनुष्य में सत्व गुण व पुण्य की वृद्धि होती है ।

भगवान या देवता की परिक्रमा करने के लाभ
जिस स्थान पर भगवान या किसी देवता की प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति या प्रतिमा स्थित होती है, उस स्थान पर देव प्रतिमा से कुछ दूरी तक उस देवता की दिव्य प्रभा व तेज (सत्व गुण) बिखरा रहता है । वह तेजोमण्डल देव प्रतिमा के पास में गहरा और दूर होने पर कम होता जाता है । देवता का तेज कल्याणकारी व साधकों का मंगल करने वाला होता है ।

भगवान की मूर्ति के चारों ओर घूमने से वे दिव्य कण हमारे शरीर में चारों ओर चिपक जाते हैं और हमारे अंदर सात्विकता, पवित्रता व पुण्यों की वृद्धि करते हैं । इसीलिए मन्दिर में गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा करने से हमें सुख, शान्ति, आरोग्य, आत्मविश्वास आदि पुण्यफलों की प्राप्ति होती है और मन खुश रहता है ।

भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को सात दिन तक अपने हाथ पर उठाया था, उसकी तलहटी में वे गोचारण किया करते थे और उसकी कुंजों और वृक्षों के नीचे उन्होंने श्रृंगार लीला की थी । आज भी करोड़ों लोग व्रज में गोवर्धन पर्वत की तलहटी में नंगे पैर चल कर या दण्डवत् परिक्रमा करते हैं । इसके पीछे भाव यही रहता है कि कहीं-न-कहीं भगवान के शरीर से स्पर्श किया हुआ कोई दिव्य रजकण अभी भी वहां की रज में दबा होगा । शायद किसी पुण्य से वह हमें स्पर्श कर जाए और हमारा जीवन धन्य हो जाए । माना जाता है कि पुरुषोत्तम मास में तो देवी-देवता भी गिरि गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं ।

शास्त्रों में पीपल, तुलसी, आंवला, बिल्व, वट आदि दिव्य वृक्षों को सींचने और उनकी परिक्रमा करने के लिए कहा गया है क्योंकि इनके स्पर्श व परिक्रमा से हमारे अंदर उनके दिव्य परमाणु प्रवेश कर जाते हैं जिससे हमारे पुण्यों में वृद्धि होती है । वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष पर मौली लपेटते हुए सुहागिन महिलाएं 108 परिक्रमा कर पति की दीर्घ आयु की कामना करती हैं ।

परिक्रमा सदैव दाहिने ओर से ही क्यों करनी चाहिए ?
दैवी शक्ति और उनका तेजोमण्डल दक्षिणावर्ती होता है अर्थात् भगवान की मूर्ति की दिव्य प्रभा सदैव दक्षिण दिशा की ओर चलती है। अत: उस दिव्य तेज की दिशा में जब हम परिक्रमा करते हुए चलते हैं तो हमें उस तेजोमण्डल से दिव्य कणों की, सत्वगुणों के परमाणुओं की और पवित्र गुणों की प्राप्ति होती है । इसलिए जितनी अधिक परिक्रमा की जाए, उतनी ही अधिक दिव्यता के कण हमें प्राप्त होते हैं । यह दिव्य कणों की प्राप्ति ही हमें देवता का वरदान है । यह हमारे संकटों और विघ्नों का नाश करने में हमारी सहायता करते हैं ।

पूजा में दायें हाथ का ही प्रयोग क्यों ?
दिव्यता, दिव्य कण, दिव्य तेज सदैव दक्षिणावर्ती होते हैं इसीलिए पूजा में दायां हाथ ही प्रयोग किया जाता है ।

उल्टी दिशा में परिक्रमा करना क्यों माना गया है पाप ?
जैसा पहले बताया गया कि दैवी आभा या तेज की गति दक्षिणावर्ती होती है । जब हम उसके विरुद्ध वामवर्ती (बांयी ओर से) परिक्रमा करते हैं तो हमारे अंदर जो दिव्य परमाणु (कण) पहले से हैं, उनमें और देवता के तेजोमण्डल की गति में संघर्ष होता है जिससे हमारे दिव्य कण नष्ट हो जाते हैं । दिव्य कणों या सत्वगुण के परमाणुओं का नाश होना ही पाप है, इसलिए बांयी ओर से (उल्टी) परिक्रमा करना महान पाप माना जाता है ।

केवल महादेवजी के तेजोमण्डल की गति दाहिनी ओर नहीं है । जलहरी के निचले भाग के कोने तक जाकर यह वापिस लौटती है, इसी कारण शिवजी की परिक्रमा विशेष प्रकार से दोनों ओर अर्धचन्द्राकार करने का विधान है ।

ध्यान रखने योग्य बात
जब कोई ऐसी दिव्य विभूति या देवता जिनकी परिक्रमा की जानी चाहिए, हमारे सामने हों लेकिन हम उनकी परिक्रमा नहीं करते हैं तो वे हमारे पुण्यों का नाश कर देते हैं और हम पाप के भागी बनते हैं । ऐसा एक आख्यान हमें पुराणों में देखने को मिलता है-

एक बार इक्ष्वाकु वंश के राजा दिलीप स्वर्ग से लौट रहे थे । रास्ते में उन्हें देवताओं की दिव्य गौ कामधेनु दिखायी दी । राजा दिलीप ने उन्हें न प्रणाम किया और न ही उनकी परिक्रमा की । इस पर कामधेनु क्रुद्ध हो गयीं । राजा दिलीप पूर्वजन्म के संस्कारों के कारण संतानहीन थे । यदि वे कामधेनु की परिक्रमा करते तो उस पुण्य से उनको आगे चलकर संतान हो सकती थी, पर वे इस लाभ से वंचित रह गए ।

राजा दिलीप के कुल गुरु ऋषि वशिष्ठ को जब राजा की इस भूल का पता चला तो उन्होंने इसके प्रायश्चित के रूप में राजा को कामधेनु की पुत्री नन्दिनी गौ की सेवा करने की आज्ञा दी । नन्दिनी गौ के वरदान से राजा पापमुक्त हो गए और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई । इक्ष्वाकु वंश में ही आगे चलकर भगवान श्रीराम प्रकट हुए ।

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