ज्योतिष

नवरात्रि में ही क्यों खेला जाता है गरबा…

अंकित राजपूत

नवरात्रि के दिनों में गरबा की धूम अलग ही रौनक जमाती है। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो नवरात्रि का इंतजार ही इसलिए करते हैं क्योंकि इस दौरान उन्हें गरबा खेलने और रंग -बिरंगे कपड़े पहनने का अवसर मिलेगा।

भारत का पश्चिमी प्रांत गुजरात तो वैसे ही गरबे की धूम के लिए अपनी अलग पहचान रखता है, लेकिन अब तो भारत समेत पूरे विश्व में नवरात्रि के पावन दिनों में गरबा खेला जाता है।
ये सब तो बहुत आम बातें हैं, जो अमूमन सभी लोग जानते हैं।

गरबा खेलना और गरबे की रौनक का आनंद उठाना तो ठीक है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि गरबा खेलने की शुरुआत कहां से हुई।

नवरात्रि के दिनों में ही इसे क्यों खेला जाता है। गरबा और नवरात्रि का कनेक्शन आज से कई वर्ष पुराना है।

पहले इसे केवल गुजरात और राजस्थान जैसे पारंपरिक स्थानों पर ही खेला जाता था, लेकिन धीरे.धीरे इसे पूरे भारत समेत विश्व के कई देशों ने स्वीकार कर लिया।

गरबा के शाब्दिक अर्थ पर गौर करें तो यह गर्भदीप से बना है। नवरात्रि के पहले दिन छिद्रों से लैंस एक मिट्टी के घड़े को स्थापित किया जाता है।



इसके अंदर दीपक प्रज्वलित किया जाता है और साथ ही चांदी का एक सिक्का रखा जाता है। इस दीपक को दीपगर्भ कहा जाता है।

दीपगर्भ के स्थापित होने के बाद महिलाएं और युवतियां रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर मां शक्ति के समक्ष नृत्य कर उन्हें प्रसन्न करती हैं।

गर्भ दीप स्त्री की सृजनशक्ति का प्रतीक है और गरबा इसी दीप गर्भ का अपभ्रंश रूप है। गरबा नृत्य में महिलाएं तालीए चुटकीए डांडिया और मंजीरों का प्रयोग भी करती हैं।

ताल देने के लिए महिलाएं दो या फिर चार के समूह में विभिन्न प्रकार से ताल देती हैं। इस दौरान देवी शक्ति और कृष्ण की रासलीला से संबंधित गीत गाए जाते हैं।

गुजरात के लोगों का मानना है कि यह नृत्य मां अंबा को बहुत प्रिय है इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए गरबा का आयोजन किया जाता है।

हिन्दू धर्म में ईश्वर की आराधना करने के लिए भजन और आरती की जाती है जिसे सिर्फ पढ़ा नहीं बल्कि संगीत और वाद्य यंत्रों के साथ गाया भी जाता है।

भक्तिरस से परिपूर्ण गरबा भी मां अंबा की भक्ति का तालियों और सुरों से लयबद्ध एक माध्यम है। आजादी से पहले गुजरात में नवाबों का राज था उस समय गरबा केवल गुजरात की ही शान हुआ करता था।

परंतु आजादी के बाद जब गुजरात के लोग अपने प्रदेश से बाहर निकले और अन्य स्थानों को अपना निवास बनाया तब धीरे-धीरे गरबा अन्य स्थानों पर भी आयोजित किया जाने लगा।

आजादी से पहले गरबा नृत्य में केवल शक्ति स्वरूपा मां अंबा को समर्पित गीत ही नहीं बल्कि देश भक्ति से ओतप्रोत और साम्राज्यवाद विरोधी गीत भी शामिल किए जाते थे।

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