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क्यों है भगोड़े भारतीय क्रिमिनल्‍स का ‘पसंदीदा डेस्‍टिनेशन’ ब्रिटेन ?

नई दिल्ली : भारत में अपराध और घपला का काला चिट्ठा खुलते ही अपराधियों के फरार होकर छिपने का ठिकाना ब्रिटेन… यही ट्रेंड बन गया है। लेकिन हर अपराधी को जैसे ही इस बात का इल्म होता है कि उसके पाप उजागर होने वाले हैं तो वह ब्रिटेन की ओर ही अपने पापों को छिपाने क्यों भागता है। आइपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी, किंगफिशर एयरलाइंस के विजय माल्या से लेकर हीरा व्यापारी नीरव मोदी तक ब्रिटेन में छिपे बैठे हैं।

जैसे ही पता चलता है कि उनके काले कारनामों का चिट्ठा खुलने वाला है, तुरंत ही वे ब्रिटेन की ओर का रुख कर लेते हैं। लेकिन सवाल उठता है- भारतीय कानून से बचने के लिए ब्रिटेन ही सुरक्षित देश क्यों है। दरअसल, ब्रिटिश मानवाधिकार आयोग दुनिया के और देशों के मानवाधिकार आयोग से ज्यादा सख्त और मानवीय पहलू को समझने वाला माना जाता है। ब्रिटेन में प्रत्यर्पण कानून ब्रिटेन में मानवाधिकार के लिए कड़े कानून हैं।

प्रत्यर्पण में देरी कर रहा ब्रिटेन : ब्रिटेन में प्रत्यर्पण प्रक्रिया की रफ्तार काफी धीमी है। भारत ने 9 प्रत्यर्पण आग्रह किए हैं जिसमें विजय माल्या, राजेश कपूर, टाइगर हनीफ, अतुल सिंह, राज कुमार पटेल, जतिंद्र कुमार अंगूराला और आशा रानी अंगूराला, संजीव कुमार चावला और शैक सादिक के नाम हैं। ये सभी आग्रह ब्रिटेन अदालत में लंबित है।

अब तक ब्रिटेन ने किया है केवल एक प्रत्यर्पण : ब्रिटेन ने अब तक केवल एक भारतीय समीरभाई विनुभाई पटेल को 2016 में प्रत्यर्पित किया इसके बाद दोनों देशों ने 1992 में प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर किए थे। पर समझौते के इतने दिनों बाद भी ब्रिटेन ने किसी भी भगोड़े को भारत को नहीं सौंपा है। वहीं भारत अब तक दो लोगों को ब्रिटेन को सौंप चुका है।

पिछले साल भारत ने सौंपी 57 भगोड़े की लिस्ट : पिछले वर्ष भारत दौरे के दौरान ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा को भारत ने ब्रिटेन को 57 भगोड़े की लिस्ट सौंपी। भारत की लिस्ट में शराब कारोबारी विजय माल्या और पूर्व आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के साथ-साथ गुजरात ब्लास्ट, पंजाब सिख दंगा, डिफेंस डील, हत्या और यौन उत्पीड़न से जुड़े आरोपी हैं। ब्रिटेन ने भी भारत को ऐसे 17 भगोड़ों की लिस्ट दी, जो ब्रिटेन की अदालत में दोषी हैं।

1992 में हुई थी प्रत्यर्पण संधि लेकिन ब्रिटेन है उदासीन : इसके बाद साल 2008 में भारत हाना फॉस्टर की हत्या के मामले में एक भारतीय मनिंदर पाल सिंह कोहली को ब्रिटेन को प्रत्यर्पित कर चुका है। इसके बाद 2009 के एक मामले में सोमैया केतन सुरेंद्र फिर 2013 के किडनैपिंग मामले में कुलविंदर सिंह उप्पल को भारत ने सौंप दिया। एक और मामला था, जिसमें भारतीय मूल के एस. देववानी को ब्रिटेन को सौंपा गया था।

प्रत्यर्पण में आती हैं ये मुश्किलें : यदि ब्रिटेन की अदालत को लगता है कि प्रत्यर्पण के बाद शख्स को प्रताड़ित किया जाएगा, मौत की सजा होगी या फिर राजनीतिक कारणों से प्रत्यर्पण कराया जा रहा है तो वे प्रत्यर्पण के आग्रह को खारिज कर देते हैं।

पहले के कई मामले ऐसे थे जिनमें तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियां इजाजत नहीं दे रही थी। दूसरे दलों की सरकार सत्ता में आती है तब तक काफी देर हो जाती है.

कई मामलों में आरोपी की उम्र अधिक होने का होता है बहाना.
आरोपी का खराब मेडिकल बैकग्राउंड भी जिम्मेदार.
भारतीय जेलों की खराब हालात बता कर भी बच जाते हैं आरोपी.

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