छत्तीसगढ़

देश में किसान क्यों मर रहा जाने बस्तर में हो रहे इस खेेल को

आठ लाख का ट्रेक्टर किसान हुआ पांच लाख का कर्जदार
जमीन गई, ट्रेक्टर गया और वसूली के लिए फाइनेंस कंपनी का दबाव
बैंक का मीटर भी चालू

–अनुराग शुक्ला

जगदलपुर. देश में किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं इसका उदाहरण अगर आपको देखना है तो बस्तर के तोकापाल ब्लॉक आईए। यहां पर फाइनेंस कंपनी, बैंक और दलालों के शह पर ऐसा खेल हो रहा है कि किसान अपनी जमीन और जायदाद को गिरवी रखकर भी एक संपन्न किसान नहीं बन पा रहा है।

आधुनिक खेती केे तौर पर किसान चाहता है कि बैंक में उसके जमीन की अच्छी कीमत मिले और केसीसी (किसान क्रेडिट कार्ड ) के जरिए उसे अपने खेत मेें सोना उगाने के लिए आधुनिक मशीन। बस्तर में ऐसा हो नहीं रहा है। यहां किसान एक कर्ज के चक्कर में दूसरा कर्ज ले रहा है और आखिरकार उसकी झोली खाली है। किसान तंग से और तंग होता जा रहा है। इसके बाद उस किसान पर फाइनेंस कंपनी और बैंक में ऋण पटाने का बोझ उसकी सोचने समझने की शक्ति को खत्म कर रहा है।

यह कहानी है तोकापाल ब्लॉक के ग्राम कुरेंगा के किसान बोटी कर्मा की इसके पास अपनी पुश्तैनी सात एकड़ तीस डेसिमिल जमीन होने से यह किसान ट्रेक्टर लेकर उन्नत खेती करने के मूड में था। वर्ष 2014 के अंत में बोटी की इस मंशा से बंशी नाम का दलाल अवगत होता है। वह उसे ट्रेक्टर दिलाने का वायदा करता है। पहले तो उसके पास की जमा पूंजी पचास हजार को लेकर वह आड़ावाल स्थित महावीर ट्रेक्टर एजेंसी पहुंचता है। बोटी को नहीं मालूम होता है कि बंशी दलाल है।

महज पचास हजार की रकम लेकर एजेंसी मालिक बोटी को ट्रेक्टर ले जाने की अनुमति दे देता है। शर्त होती है कि दो माह में फाइनेंस करवाकर किश्त और कंपनी को छह माह का 83 हजार रूपए के किश्त की अदायगी करना होगा। ट्रेक्टर पाकर खुश बोटी अभी घर भी नहीं पहुंचता है कि बंशी बोटी के गांव पहुंचता है। ट्रेक्टर दिलाने के नाम पर दो हजार रूपए लेता है और बोटी को आश्वासन देता है कि यदि वो चाहे तो बैंक से उसे पैसे दिला देगा।

सवा सात एकड़ भूमि के दस्तावेजों के साथ बंशी अपने काम पर लग जाता है। एक सप्ताह में ही वो बोटी को सूचना देता है कि यूनियन बैंक से उसकी जमीन के एवज में तीन लाख का फाइनेंस हो चुका है। इस रकम के आने से अब बोटी को आस जागती है कि फाइनेंस कंपनी जो पैसे उसे दे रही है उसकी अदायगी कर सकेगा और ट्रेक्टर एजेंसी को पैसे भी देगा।

बैंक की संदिग्ध भूमिका

अब जब बोटी के पैसे लेने की बारी आती है तो बोटी के मां- पिता को बुलाया जाता है। बैंक अधिकारी बोटी को पैसे देने को तैयार होता है। यहां बंशी बोटी से कहता है कि इतने पैसे लेकर क्या करेगा। एक लाख सत्तर हजार लेने से काम हो जाएगा। जब तक बोटी कुछ समझता या विरोध करता बंशी उसे 1.70 लाख रूपए दिलवा देता है। इसमें से 25 हजार वो अपना मेहनताना बोलकर रख लेता है। शेष 1.44 हजार ट्रेक्टर एजेंसी में जमा किया जाता है। इसे ट्रेक्टर कंपनी किश्त के नाम पर जमा कर लेता है। बैंक बंशी के कहने पर किस तरह पैसे देेती है यह आज तक समझ से परे है।

ट्रेक्टर के खेल से निकला नहीं ट्राली में फंसा

फाइनेंस कंपनी और महिन्द्रा एजेंसी में किश्त का बोझ लिए किसान बोटी पर एक और गाज गिरी जब उसने ट्रेक्टर से पैसे कमानी की सोची। शहर के गिट्टी व्यापारी सत्यनारायण अग्रवाल ने इस किसान के ट्रेक्टर को अपनी खदान में काम दिलाने के नाम पर उसे ट्राली दिला दी। बोटी बताता है कि यह करार हुआ था कि ट्रेेक्टर की आय से पैसे काटकर छह माह का किश्त महिन्द्रा ट्रेक्टर में जमा किया जाएगा। इस बीच ट्राली का जो पैसा है वह भी कटेगा। बोटी पर ट्राली का भी ब्याज लगा तीन सप्ताह तक उसने ट्राली के नाम पर हजार रूपए का ब्याज दिया जो उसे हिसाब से कटता रहा। इसके बाद व्यापारी को लगा कि यह पैसे कम हैं उसने ट्रेक्टर ट्राली की रखवाली का हवाला देते बोटी से अठारह सौ रूप लेना शुरू किया।

किसान ने उधार के लिए हाथ फैलाया

कर्ज में खुद को डूबता देख किसान बोटी ने अब हाथ फैलाना शुरू किया। दो साल का समय बीतने के बाद भी ट्रेक्टर किसान के खेत की शोभा नहीं बढ़ा सका था। बोटी ने किसी तरह कर्ज से उभरने के लिए गांव के बालो होगसीगुड़ा से 30 हजार, तेतरखूटी स्व सहायता समूह से 35 हजार रूपए, मोसू, डाकी व बुधराम बाण्डापारा से 15 हजार रूपए, दोदरगुड़ा के पाण्डो से पंद्रह हजार रूपए, स्वसहायता समूह बाण्डापारा से पांच हजार, बाण्डापारा के सायको से 46 हजार, होंगसीगुड़ा के तुलसा से 30 हजार रूपए का कर्ज लिया। बोटी चाहता था कि इन पैसों से वो टे्रक्टर कंपनी में जाकर किश्त के पैसे अदा कर दे। इस बीच ही उसके ट्रेक्टर को किश्त न पटानेे से जब्त कर लिया गया था।

पैसे भी गए और होश भी उड़ गया

बोटी जब दो बार का किश्त करीब एक लाख साठ हजार रूपए लेकर महिन्द्र फाइनेंस पहुंचा तो पहले तो उसकी किश्त के पैसों को जमा किया गया इसके बाद किसान को बोला गया कि तुम्हारा ट्रेक्टर फाइनेंस कंपनी ने बेच दिया है। किसान को आस थी कि ट्रेक्टर तो गया ट्राली से ही कुछ मिल जाए जब वह गिट्टी व्यापारी के पास पहुंचा तो उसने हिसाब का खर्रा उसे थमाया और बताया कि ट्राली का हिसाब बराबर हो चुका है।

उसके हिसाब में 27 हजार रूपए निकल रहे हैं जो किसान को दे दिया गया। बात यही खत्म नहीं होती परेशान किसान पर आखरी गाज तब गिरती है जब उसका ट्रेक्टर बिक जाता है ट्राली छिन जाती है, वह बैंक का कर्जदार हो जाता है और इसके बाद फाइनेंस कंपनी का एक कागज आता है कि ट्रेक्टर बिकने के बाद भी अभी उसे करीब पौने दो लाख रूपए शेष पटाना है। इसके बाद किसान के होश फाख्ता हो जाते हैं अब वह मद्द की गुहार लगाते फिर रहा है। खाली जेब, सूने खेत, कर्ज में दबे किसान के पास क्या रास्ता है इसे तय करना कठिन है।

 

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