भगवान राम को सिंहासन न मिलकर क्यों मिला वनवास – क्या कहती है भगवान राम की पत्री

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव 8178677715, 9811598848

जल्द ही अयोध्या में भगवान राम के मंदिर का कोर्ट फैसला आने वाला है। हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही बेसब्री से फैसले का इंतजार कर रहे हैं। फैसला जो भी आये और जिस भी वर्ग के पक्ष में आए। प्रत्येक पक्ष को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरा सम्मान करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी न्याय संस्था हैं और वह प्रत्येक वर्ग, जाति, समुदाय और धर्म से ऊपर है।

न्यायप्रणाली में आस्था और विश्वास

उसके फैसले व्यक्तिगत ना होकर न्यायपूर्ण होते हैं और देश में न्याय व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि न्यायप्रणाली में आस्था और विश्वास हो। 2020 से 2022 में भगवान राम के मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हो जाएगा, ऐसी भविष्णवाणी हम पूर्व ही कर चुके है।

आज हम यह विश्लेषण करने जा रहे है कि भगवान राम को सिंहासन मिलने वाला था, परन्तु रातोंरात स्थिति बदल गई और उन्हें चौदह वर्ष के लिए वनवास के लिए जाना पड़ा। ऐसे कौन से ग्रह योग थे, जिनके फलस्वरुप यह स्थिति बनी। आईये जानें-

भगवान राम की कुंडली विश्लेषण

भगवान राम की कुंड्ली कर्क लग्न और कर्क राशि की है। लग्न में गुरु-चंद्र युति, पराक्रम भाव में राहु, चतुर्थ में शनि, सप्तम में मंगल, शुक्र-केतु नवम भाव, सूर्य दशम भाव, बुध एकादश भावस्थ है।

ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार यदि लग्न और सप्तम दोनों में उच्चस्थ ग्रह स्थित हों तो व्यक्ति को विवाह के बाद अवनति का सामना करना पड़ता है। पद-प्रतिष्ठा के लिए चतुर्थ और द्वितीय भाव का विचार किया जाता है। यहां चतुर्थेश शुक्र नवम भाव में राहु/केतु अक्ष में होने के कारण पीडित है और पूर्ण फल देने की स्थिति में नहीं है।

सप्तम से चतुर्थ भाव अर्थात दशम भाव में सूर्य उच्च पद, सम्मान और अधिकारिक शक्तियां तो देता है परन्तु यहां यह वैवाहिक सुख का नाश करता है। इसी प्रकार द्वादशेश बुध का स्वयं से द्वादश भावस्थ होना शयन सुख में कमी करता है। कुछ ज्योतिषी मतों के अनुसार जब लग्न और सप्तम दोनों भाव उच्च के ग्रहों से युक्त होते हैं तो ग्रह त्याग कर वनवास जाना पड़ता है।

वैदिक ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार यदि सौम्य ग्रह अर्थात वॄष, मिथुन, कर्क, तुला, धनु और मीन लग्न हो, उसमें सौ म्य ग्रह अर्थात शुभ ग्रह स्थित हो और उन्हें कम से कम दो पाप ग्रह पूर्ण दृष्टि दे रहें हो तो व्यक्ति कितना भी बड़ा राजा हो, कुंडली कितने भी राजयोगों से युक्त हो, ऐसे मॆं राजभंग होता है। ऐसा व्यक्ति राजा के घर जन्म लेकर भी राजसिक जीवन नहीं जी पाता है।

उपरोक्त कुंडली में गुरु-चंद्र दोनों लग्नस्थ है और इन्हें मंगल सप्तम दृष्टि से व शनि दशम दृष्टि से देख रहे हैं। इसके अतिरिक्त राहु भी शुक्र को देख रहें है। शनि व सूर्य सप्तसप्तक योग में स्थित है। शनि-सूर्य की युति या दोनों का सप्तसप्तक योग में होना पिता का पुत्र से वियोग देता है।

संतान को जातक से अधिक पराक्रमी

अनुभव मंह पाया गया है कि कर्क लग्न की कुंडलियों में पंचमेश का सप्तम भाव में स्थित होना, व्यक्ति की संतान की संतान को जातक से अधिक पराक्रमी बनाता है। यह योग अनेकोनेक कुंडलियों पर लगा कर देखा, पूर्ण फल देता है। आप भी लगाकर देंखे और अपने अनुभव बतायें।

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री 8178677715, 9811598848

ज्योतिष आचार्या रेखाकल्पदेव पिछले 15 वर्षों से सटीक ज्योतिषीय फलादेश और घटना काल निर्धारण करने में महारत रखती है। कई प्रसिद्ध वेबसाईटस के लिए रेखा ज्योतिष परामर्श कार्य कर चुकी हैं।

आचार्या रेखा एक बेहतरीन लेखिका भी हैं। इनके लिखे लेख कई बड़ी वेबसाईट, ई पत्रिकाओं और विश्व की सबसे चर्चित ज्योतिषीय पत्रिकाओं में शोधारित लेख एवं भविष्यकथन के कॉलम नियमित रुप से प्रकाशित होते रहते हैं।

जीवन की स्थिति, आय, करियर, नौकरी, प्रेम जीवन, वैवाहिक जीवन, व्यापार, विदेशी यात्रा, ऋणऔर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, धन, बच्चे, शिक्षा,विवाह, कानूनी विवाद, धार्मिक मान्यताओं और सर्जरी सहित जीवन के विभिन्न पहलुओं को फलादेश के माध्यम से हल करने में विशेषज्ञता रखती हैं।
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