दो टूक (श्याम वेताल) : बदलाव होना चाहिए पर क्यों  कोई ठोस कारण तो बताए…

Vetal-Sir
श्याम वेताल

रमन सरकार जाने वाली है… शिवराज सरकार चला – चली की बेला में हैं… और रानी की सरकार तो मानो चल बसी… ये चर्चाएं आज गली – महोल्ले से लेकर होटल – रेस्टोरेंटस में खुलकर चल रही है। सभी इन सरकारों के निपट जाने की बात तो करते हैं लेकिन कोई ठोस कारण नहीं बताते हैं। कारण पूछने पर इतना ही कहते हैं कि बस बहुत हो गया, 15 साल बहुत होते हैं, अब बदलाव होना चाहिए।

निसंदेह बदलाव या परिवर्तन अच्छी बात है, परिवर्तन से प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है लेकिन परिवर्तन के बाद कुछ नया होने की उम्मीद हो तो इसे अच्छा कहा जाएगा और नया होने के लिए कोई नया नेतृत्व नया दल होना चाहिए। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में जिस बदलाव की बातें चल रही है उनमे तीनों राज्यों में भाजपा के स्थान का कांग्रेस को सत्ता सौपनें की बातें चल रही है. यह बताने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस वही पार्टी है जिसने न केवल उपरोक्त तीनों राज्यों में बल्कि लगभग पूरे देश के हर राज्य पर अपना परचम लहराया और बरसो तक इन तीनों राज्यों पर राज किया है।

कहने का आशय है कि कांग्रेस पार्टी किसी के लिए नयी नहीं है. हर किसी को कांग्रेस के काम करने का तरीका मालूम है. भाजपा युग आने से पहले देश में कांग्रेस का ही बोलबाला था. हां… दिल्ली की तरह आम आदमी पार्टी की जैसी कोई नयी पार्टी पूरी गंभीरता के साथ आकर लोगों से कहती हे कि हटाओ भाजपा को, हमें मौका दो तो शायद लोगों के मन में भाजपा को हटाने की बात मन में उतरती। अभी तीनों राज्यों में से कम से कम छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश का मतदाता दुविधा में हैं. कांग्रेस के लुभावने और आकर्षक विज्ञापन वोटर को यह सोचने पर मजबूर कर रहें है कि हमें क्या करना चाहिए, किधर जाना चाहिए।

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में 15 साल पहले तक कांग्रेस की ही सरकार रही है और लोगों को कांग्रेस का कार्यकाल भूला नहीं है जब विकास सबसे निचली पायदान पर रहा.

इसके अलावा, तीनों राज्यों क्र मतदाताओं के सामने एक प्रश्न है जिसका जवाब कांग्रेस ने दिल्ली के अपने आकाओं पर छोड़ रखा है. तीनों राज्यों में यह नहीं बताया गया कि यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो मुख्यमंत्री कौन होगा? छत्तीसगढ़ कांग्रेस में आधा दर्जन बड़े नेता है. जो मुख्यमंत्री की कुर्सी की ओर आस लगाए बैठे हैं. उसी तरह कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत प्रदेश स्तर के भी दो – तीन नेताओं को कुछ इस तरह से प्रोजेक्ट कर रखा है की इन में से किसी को भी मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. मतलब मतदाताओं के लिए अनिश्चय की स्थिति बनाकर रखी गयी है. यही हाल राजस्थान का है जहां कांग्रेस ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों को चुनाव टिकट देकर भ्रम की स्थिति बना दी है.

जहां तक मैं मध्यप्रदेश का प्रश्न है, यहां कांग्रेस पार्टी में असंतोष की स्थिति देखने को मिलती है. टिकट वितरण से असंतुष्ट लोगों ने बड़ी संख्या में बगावत का बिगुल बजाया था. नतीजा यह हुआ कि पार्टी को उनका निष्कासन करना पड़ा। पार्टी की इस कलह का असर भी मतदाताओं पर पड़ेगा।

बड़े नेताओं के खिलाफ भी तनातनी की खबरें आती रही. दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच बैठक में वाद – विवाद होने का समाचार आया लेकिन दोनों नेताओं ने अगले दिन खंडन कर दिया।

हालांकि राजस्थान ने वसुंधरा के खिलाफ वातावरण है लेकिन कांग्रेस को चुनने से पहले मतदाता यह जरूर सोचेगा कि अगर कांग्रेस आयी तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा?

इसके अलावा तीनों राज्यों में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी सौ प्रतिशत सकारात्मक प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं रहे. किसानों का कर्ज 10 दिन में माफ़ और बिजली बिल हाफ के वादे कांग्रेस को कुछ बढ़त दे सकते हैं लेकिन लिए ये वादे काफी नहीं दिखते हैं.

बहरहाल, छत्तीसगढ़ में तो मतदाताओं ने अपनी सरकार चुन ली है लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थान में अभी मतदान होना है. 11 दिसंबर को परिणाम आने पर ही पता चलेगा कि तीनों राज्यों में मतदाता का मन मौजूदा सरकार से डोल गया या वह कांग्रेस के लुभाने वादों पर झूम गया.

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