छत्तीसगढ़

सम्यक ज्ञान दर्शन व चारित्र्य के बिना मोक्ष प्राप्ति संभव नहीं : साध्वी रत्ननिधि

रायपुर,(वीएनएस)। श्री ऋषभदेव जैन श्वेताम्बर मंदिर सदरबाजार में जारी चातुर्मासिक आराधना के अंतर्गत साध्वी रत्ननिधिश्रीजी म.सा ने उमास्वातिजी महाराज रचित तत्वार्थ सूत्र के प्रथम श्लोक `सम्यक ज्ञान दर्शन चारित्राणि मोक्ष मार्ग` पर केंद्रित प्रवचन करते कहा कि मोक्ष प्राप्ति के लिए सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन व सम्यक चारित्र्य का होना नितांत आवश्यक है। इन रत्न त्रय के माध्यम से ही हम मोक्ष मंजिल को पा सकते हैं। सबसे पहले लक्ष्य निर्धारण आवश्यक है कि आपको कहां जाना है, मोक्ष जाना है तो फिर मोक्ष जाने के माध्यमों व साधनों को आत्मस्थ करना होगा। क्योंकि मोक्ष की प्राप्ति सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन व सम्यक चारित्र्य के बिना संभव नहीं है। उसी प्रकार बिना सम्यक दर्शन के व्यक्ति चाहे जितना ज्ञानार्जन कर ले उसका वह ज्ञान अधूरा-अपूर्ण ही है। मोक्ष प्राप्ति के लक्ष्य से सम्यक के बिना वह ज्ञान अज्ञान दशा में ही है। सम्यक दर्शन की महत्ता शून्य के आगे लगने वाले एक के अंक की तरह है। जिस प्रकार बिना अंक के शून्य चाहे जितने लगाओ उनका कोई मूल्य नहीं, उसी प्रकार सम्यक दर्शन उस महत्वपूर्ण एक के अंक की भांति है। एक के अंक के बाद जितने शून्य लगाओगे तो उसका मोल उतना ही बढ़ता चला जाएगा, सम्यक ज्ञान का महत्व तो है लेकिन सम्यक दर्शन के बाद ही वह महत्वपूर्ण और मूल्यवान है। बिना सम्यक दर्शन के जीव साढ़े 9 पूर्वों तक अध्ययन करता रहे लेकिन फिर भी उसके उस ज्ञान का मोक्ष प्राप्ति के लक्ष्य से कोई महत्व नहीं। सम्यक दर्शन केवल पंचेन्द्रिय जीव को ही हो सकता है अन्य जीवों को नहीं। जैसे ही सम्यक दर्शन की प्राप्ति होती है, जीव का सारा अज्ञान, ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है और उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य होता है मोक्ष प्राप्ति। सम्यक दर्शन ही मोक्ष प्राप्ति का राजमार्ग है। ज्ञान से आयी श्रद्धा बहुत अधिक प्रभावक होती है और केवल परम्परा से मिली श्रद्धा का प्रभाव आंशिक रूप में ही होता है। श्रद्धा लाने के लिए आगम सूत्रों के अर्थों का ज्ञान भी जरूरी है। ज्ञान से ही गहराई आती है और श्रद्धा का बल अपने आप बढ़ता है। सम्यक दर्शन होने के बाद जीव से न तो नर्क गति का बंध होता है और न ही त्रियंच गति का।

धर्म-कर्म का भी करें विस्तार : सिद्धांतनिधिश्री
प्रवचन सभा के पूर्वाध में साध्वी सिद्धांतनिधिश्री ने कहा कि जिस प्रकार सांसारिक जीवनयापन करते हुए आपकी जरूरतों का दिनों दिन विस्तार होता ही चला जाता है, उसी प्रकार धर्म-कर्म को भी विस्तारित किया जाना चाहिए। तभी एक गृहस्थ संतुलित जीवन जीते हुए श्रावक की कोटि में आ सकता है। धन-दौलत का हिसाब तो मनुष्य ने खूब किया, हिसाब मिलाने रात-रात बैठा लेकिन कभी अपने पाप और पुण्यों का भी हिसाब मिलाने के लिए वह एकांत में जाकर बैठा? कभी चिंतन किया कि कुटुम्ब-परिवार, घर-मकान आदि के विस्तार के साथ-साथ बढ़ती जरूरतों के कारण बढ़े पापाचार और उससे हुए कर्म बंधों की निर्जरा के लिए अब मुझे जप-तप, स्वाध्याय, सामायिक भी बढ़ा देनी चाहिए। सांसारिक पदार्थों की जरूरत व्यक्ति को बहुत महसूस होती है क्योंकि उसकी रुचि व लालसा संसार से जुड़ी हुई है जब तक धर्म मार्ग से पुण्यार्जन की ललक नहीं होगी तब तक व्यक्ति भावपूर्वक धर्म-कर्म नहीं कर पाता। धर्म को समझना है तो सबसे पहले विनय भाव आना चाहिए। परमात्मा, गुरुओं और जिनवाणी के प्रति विनय भाव होना चाहिए। यदि जिनवाणी प्रवचन चल रहा है और आप श्रवण छोड़कर पूजन या जाप में लगे हुए हैं तो वह भी जिनवाणी की असातना ही हुई। क्योंकि जिनवाणी आत्मिक उत्थान की मार्गदर्शक है। उसमें आत्मा की प्रगति का संदेश है।

श्री ऋषभदेव जैन मंदिर ट्स्र्ट के ट्स्र्टी प्रकाशचंद सुराना ने बताया कि 31 दिवसीय दादा गुरुदेव इकतीसा जाप का आज 15वां दिन रहा, जिसमें श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में सहभागी होकर दादा गुरुदेवों की महामंगलकारी महिमा का गुणगान किया। मंदिर परिसर के आराधना हॉल में इकतीसा जाप 7 जुलाई से प्रतिदिन रात्रि 8.30 से 9.30 तक किया जा रहा है। आगामी 6 अगस्त तक चलने वाले इस दादा गुरुदेव इकतीसा जाप के आयोजन में सुरेश बुरड़, नरेन्द्र लोढ़ा, निर्मल गोलछा व हरीश डागा आदि गुरुभक्तों की प्रमुख सहभागिता बनी हुई है। इकतीसा जाप के आयोजक हैं- श्री ऋषभदेव मंदिर ट्स्र्ट, चातुर्मास समिति-2017 सदरबाजार एवं वर्धमान सेवा संघ शैलेन्द्रनगर, रायपुर।

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