आधुनिकता से नहीं अपितु अध्यात्म से होगा महिला सशक्तिकरण : छाया वर्मा

रायपुर: राज्यसभा सांसद श्रीमती छाया वर्मा ने कहा कि महिला सशक्तिकरण आधुनिकता से नहीं अपितु अध्यात्म से होगा । हम आधुनिकता में इतना न रम जाएं कि अपनी संस्कृति को ही भुल जाएं।

श्रीमती छाया वर्मा अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय द्वारा शान्ति सरोवर में आयोजित महिला जागृति आध्यात्मिक सम्मेलन में बोल रही थीं। विषय था -वर्तमान बदलती परिस्थितियों में आध्यात्मिकता की आवश्यकता। उन्होंने बतलाया कि पहले सामाजिक सरंचना ऐसी होती थी कि खुलकर हंसने और बोलने तक की स्वतंत्रता महिलाओं को नहीं होती थी। किन्तु आज समय बदल चुका है।

पहले महिलाएं अपनी इच्छाओं को दबाकर रखती थीं। लेकिन आज वह पुरूषों की तरह ही हर काम कर सकती हैं। पण्डवानी गायिका श्रीमती तीजन बाई इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। एक गरीब घर की गांव की महिला ने अनपढ़ होते हुए भी देश-विदेश में खूब नाम कमाया।

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी संगठन की क्षेत्रीय निदेशिका ब्रम्हाकुमारी कमला दीदी ने कहा कि वर्तमान समय संसार में समस्याओं की भरमार है इसलिए ऐसे समाज में रहने के लिए जीवन में आध्यात्मिकता का होना जरूरी है। इससे जीवन में सहनशीलता, नम्रता, मधुरता आदि दैवी गुण आते हैं।

उन्होंने कहा कि आदि काल में जब महिला आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न थी तब उसकी पूजा होती थी। मनुष्य शक्ति मांगने के लिए दुर्गा या अन्य देवियों के पास जाते हैं, किसी को धन चाहिए तो लक्ष्मी के पास जाते हैं, बुद्घि चाहिए तो सरस्वती की अराधना करते हैं। किन्तु आज की नारी अध्यात्म से दूर होने के फलस्वरूप पूज्यनीय नही रही। भौतिक दृष्टिï से नारी ने बहुत तरक्की की है किन्तु आध्यात्मिकता से वह दूर हो गई है।

जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती शारदा देवी वर्मा ने कहा कि परमात्मा ने पुरूष और स्त्री दोनों को समान रूप से शरीर दिया है फिर हम दोनों में भेदभाव क्यों करते हैं? दोनों के साथ समानता का व्यवहार क्यों नहीं करते हैं? घरों में बेटों को ज्यादा स्वतंत्रता होती है किन्तु बेटियों को घर के काम-काज में सारा दिन हम व्यस्त रखते हैं। बेटियों के साथ-साथ बेटों को भी घर का काम सिखलाना चाहिए। उन्होंने समारोह में उपस्थित महिलाओं से देवत्व की शुरूआत अपने घर से करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि मांस, मदिरा और अन्य सामाजिक कुरीतियों का परित्याग कर अपने परिवार और समाज को देवत्व की ओर ले जाने का कार्य करें।

पूर्व महापौर एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीमती किरणमयी नायक ने कहा कि वह अपने दिन की शुरूआत मेडिटेशन से करती हैं जिससे उन्हें सारा दिन आत्मविश्वास के साथ तनावमुक्त रहकर कार्य करने में मदद मिलती है। उन्होंने बतलाया कि लोग अपने दिमाग का बहुत ही कम उपयोग कर पाते हैं। बच्चा चार-पांच साल की उम्र तक पचास प्रतिशत जीवनोपयोगी बातों को सीख चुका होता है, शेष पचास प्रतिशत बातों को सीखने में उसकी पूरी उम्र निकल जाती है। इसका कारण है कि बाल्यावस्था में हमारा ब्रेन सुपर एक्टिव होता है। पाजिटिव थिंकिंग से जीवन को सुख और शान्ति सम्पन्न बनाकर हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा की शुरूआत कर सकते हैं।

राजयोग शिक्षिका ब्रह्माकुमारी दीक्षा बहन ने कहा कि महिलाओं को पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकरण नहीं करना चाहिए बल्कि अपने जीवन में भौतिकता और आध्यात्मिकता का सन्तुलन बनाकर चलना चाहिए। स्वतंत्रता का मतलब स्वच्छंदता नहीं है।

आधुनिकता से नहीं अपितु अध्यात्म से होगा महिला सशक्तिकरण : छाया वर्मा

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