राष्ट्रीय

राजनीतिक व्यवस्था के आगे मजबूर हुआ मजदूर

राजेश तिवारी, सामाजिक कार्यकर्ता

राजेश तिवारी के कलम से….

हमारा देश बहुआयामी और बहुधर्मी देश है, लेकिन इन सबके बीच हम हरदम एक धर्म का सारे लोग पालन करते हैं और वह धर्म है मानवता का, यह धर्म पालन करने के लिये हमें किसी पार्टी का सदस्य, सरकारी व्यवस्था का अंग, किसी मजहबी शाखा का अनुयायी होना बिल्कुल जरुरी नही, इसकी सिर्फ एक शर्त होती है कि हम मानव हों और हमारे पास दया ,करुणा और स्नेह जैसे ईश्वर प्रदत्त गुण विद्यमान हों, अब मै भूमिका पर आता है , निश्चित तौर पर कोरोना संकट से सारे विश्व में अफरातफरी और सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक अस्थिरता का माहौल है, तो यह मामला भारत जैसे 138 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में ज्यादा होना स्वाभाविक है, लेकिन यहाँ कुछ प्रश्न ऐसे हैं जिन्हें हम नजर अंदाज नही कर सकते, और मेरा प्रश्न आर्थिक पैकेज, या राजनैतिक बातों से हटकर है, और वह है भारत के उन निर्माण कर्ता वर्ग के लिये है जिन्हे हम मजदूर कहते हैं और हमारा समाज और सरकारें जिन्हें मजबूर समझती हैं, जिन्होंने अंतरिक्ष से लेकर सागर तक और धरा पर सारी उपलब्धियों को अपना रक्त दिया है, बदले में कहीं शहांशाह ने कहीं उनके हाँथ काट लिये या फिर सरकारों ने उन्हें रेल की पटरी पर कट जाने के लिये अप्रत्यक्ष रुप से मजबूर कर दिया, आप चाहे जिस शहर के निवासी हों अक्सर आप को आजकल बहुत से भूखे, प्यासे और लाचार लोग दिख जाते होंगे सर पर गठरी रक्खे अपने गंतव्य की तरफ जाते हुये, वो भी कोई सौ दो सौ किलोमीटर नही बल्कि हजारों किमी की यात्रा करके आते हुये, यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या सरकार ने कंपनी मालिकों को कोई ऐसा स्पष्ट आदेश दिया था कि अगर आपने इनके रहने खाने और इलाज की समुचित व्यवस्था नही की तो आप की फैक्ट्री का लाइसेंस रद्द कर दिया जायेगा,

शायद नही, हृदय फट जाता है सुनकर जब पढ़ता हूँ समाचारों में कोई महिला अपने बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद उसे गोंद में लेकर भूखे प्यासे सैकड़ों किमी की यात्रा पैदल कर रही है, कहाँ गयी एम्बुलेंस की आपातकालीन सेवायें, कोई भारी वाहनों से दबकर कुचल जा रहा है, और उसका रक्त हमारे मुंह पर कातिल होने का हस्ताक्षर कर रहा है, क्या हमें खुद को इंसान होने का हक है, जब तक आर्थिक पैकेज भाषण से निकलकर जमीन में आयेगा (आयेगा या हरदम की तरह माइक पर ही रह जायेगा ) तब तक न जाने कितने मासूम सपनों को जमीन निगल गई होगी, सरकारें को शर्म आना चाहिये कि हम अपने निर्माण कर्ता को नही बचा पा रहे हैं, ट्रेन, बस पहले भी सुव्यवस्थित तरीके से चलाये जा सकते थे, और शायद बहुत सी जिन्दगियों को हम बचा सकते थे, लेकिन मजदूर बेचारे सरकार की दिशाहीन और आडम्बर भरी दंभ के भेंट चढ़ गये, इस समय किसी भी पार्टी के आई टी सेल को राहत शिविर के रुप में काम करना चाहिये था( जैसे भारतीय युवा काँग्रेस कर रही है) लेकिन ऐसी स्थिति में भी युवा नेता या संगठन नेताओँ को खुश रखने की कवायद में पड़े हैं, टी वी एंकर खुद पर धमकी और टी आर पी के चक्कर में अपना कर्तव्य भूल गये हैं,

मेरी युवाओ से अपील है कि आप सारे बंधनो से परे हटकर सड़कों पर बिखरती जिंदगी बचा लीजिये, सरकार से सिर्फ़ भाषण की ही उम्मीद की जा सकती है हाँ कुछ राज्य सरकारों ने अच्छा काम किया है इसके लिये वह बधाई के पात्र हैं, बस इतना समझ लीजिये मजदूर कभी मजबूर नही होता , वह हमारे मजबूत भारत का आधार स्तम्भ है,

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