छत्तीसगढ़

गायत्री शक्ति पीठ के सौजन्य से प्राकृतिक चिकित्सा विषय पर कार्यशाला

श्री साईनाथ को पुष्पांजलि अर्पित कर दीप प्रज्ज्वलित

अम्बिकापुर: श्री साई बाबा आदर्श महाविद्यालय में गायत्री शक्ति पीठ के सौजन्य से प्राकृतिक चिकित्सा विषय पर कार्यशालाला का आयोजन महाविद्यालय सभाकक्ष में किया गया। इस कार्यशाला में मध्यप्रदेष प्राकृतिक चिकित्सा परिषद भोपाल के अध्यक्ष डाॅ. कन्हैयालाल रंगवानी एवं प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र आमलखेड़ा के महेष सिंह ने छात्र-छात्राओं का मार्गदर्शन किया।

कार्यषाला के प्रारंभ में सभी अतिथियों एवं प्राचार्य डाॅ. राजेश श्रीवास्तव ने मां सरस्वती एवं श्री साईनाथ को पुष्पांजलि अर्पित कर दीप प्रज्ज्वलित किया। अतिथियों का स्वागत प्राचार्य, विज्ञान विभागाध्यक्ष अरविन्द तिवारी, शैलेष देवांगन एवं डाॅ. श्रीाराम बघेल ने पुष्पगुच्छ प्रदान कर किया।

प्राचार्य ने कार्यशाला की उपादेयता पर प्रकाश डाला

स्वागत उद्बोधन करते हुए प्राचार्य ने कार्यशाला की उपादेयता पर प्रकाश डाला। उन्होने भारतीय संस्कृति एवं प्रकृति के संरक्षण की बात करते हुए प्रकृति के साहचर्य से निरोग रहने की बात कही।

प्रारंभिक उद्बोधन में गायत्री शक्ति पीठ अंबिकापुर के जी.पी. स्वर्णकार ने कहा कि सभी धर्मों की प्रार्थना में भाषा शब्दों एवं पद्धति की विविधता के बावजूद प्राणिमात्र के उत्कर्ष की ही कामना है। निरोगी शरीर ही सभी उपलब्धियों का कारण है। अतः ईष्वर द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक तत्वों से ईष्वर प्रदत्त शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है।

कार्यषाला का संचालन करते हुए क्रीड़ा अधिकारी ब्रम्हेष श्रीवास्तव ने कहा कि प्राचीन भारतीय साहित्य में वर्णित है कि जो कुछ इस पिण्ड अर्थात शरीर में है वही संपूर्ण ब्रम्हांड में है। शरीर ही समस्त दायित्वों के निर्वहन का माध्यम है ओर स्थूल रूप से पांच प्राकृतिक तत्वों से निर्मित है। कफ, पित्त एवं वात का अनुकूल साम्य ही शारीरिक स्वास्थ्य है जिसे पांच महाभूतों की सहायता से प्राप्त किया जा सकता है।

वर्णित सात सुखों का उल्लेख करते हुए कहा

मुख्य वक्ता डाॅ. कन्हैयालाल संगवानी ने शास्त्रों में वर्णित सात सुखों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन सब में निरोगी काया अर्थात शारीरिक स्वास्थ्य को प्रथम स्थान दिया गया है।

तीव्र अर्थात तात्कालिक रोगों का सही उपचार न होने से वे जीर्ण एवं असाध्य रोगों में परिवर्तित हो जाते है। तीव्र रोगों के उपचार के लिए चार चरण की पद्धति है जिनमें उपवास, एनीमा, जल एवं आराम शामिल है।

फलाहार, रसाहार, उचित दिनचर्या तथा उचित आहार द्वारा रोगों से बचा भी जा सकता है तथा रोगमुक्त भी हुआ जा सकता है। आमलखेड़ा प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र के महेष सिंह ने कहा कि अपषिष्टों की अधिकता एवं एकत्रीकरण ही रोग का कारण है। जिन्हें हम बीमारी समझते है वे प्रस्तुतः रोग के लक्षण है जो हमें आहार विहार में परिवर्तन की आवष्यकता का संकेत देते है।

कार्यक्रम के अंत में डाॅ. रंगवानी ने महाविद्यालय को प्राकृतिक चिकित्सा की पुस्तकें भेंट की। कार्यशाला में विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों सहित सहायक प्राध्यापक अभिषेक कुमार एवं मुकेश गुप्ता उपस्थित रहे।

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