छत्तीसगढ़ में पाटजात्रा पूजा विधान के साथ विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व शुरू

75 दिनों में संपन्ना होती बस्तर दशहरा के रस्में

जगदलपुर: हरियाली अमावस्या मनाने के साथ ही छत्तीसगढ़ का विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व शुरू हो गया है।यहाँ दंतेश्वरी मंदिर के सामने बस्तर दशहरा की पहली रस्म पाटजात्रा कल सम्पन्न हुई। दशहरा पर्व के लिए विशाल रथ बनाने वाले बेड़ा और झार उमरगांव के कारीगरों ने कुरंदी जंगल से लाए गए साल वृक्ष का टुकड़ा टुरलू खोटला का विधिवत पूजा अर्चना की।

रविवार सुबह 11 बजे दंतेश्वरी मंदिर के सामने बस्तर दशहरा की पहली रस्म पाटजात्रा संपन्ना हुई। पर्व के लिए विशाल रथ बनाने वाले बेड़ा और झार उमरगांव के कारीगरों ने कुरंदी जंगल से लाए गए साल वृक्ष का टुकड़ा ‘टुरलू खोटला’ की विधिवत पूजा अर्चना की। इस मौके पर संसदीय सचिव व स्थानीय विधायक रेखचंद जैन समेत एसडीएम जीआर मरकाम, तसहीलदार पुष्पराज पात्र, बस्तर दशहरा समिति के पदाधिकारी, मांझी- चालकी और मेंबर – मेंबरीन मौजूद रहे।

75 दिनों में संपन्ना होती बस्तर दशहरा के रस्में

विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के रस्में 75 दिनों में संपन्ना होती हैं। इसकी शुरुआत हरियाली अमावस्या के दिन होती है। सबसे पहले शुक्रवार को ग्राम बिलोरी के ग्रामीणों ने कुरंदी जंगल में एक साल वृक्ष की पूजा अर्चना कर उसे काटा और विशेष वाहन से मां दंतेश्वरी मंदिर के सामने लाकर रखा। रविवार सुबह 11 बजे बस्तर राज परिवार द्वारा पाटजात्रा पूजन सामग्री पहुंचाई गई, तत्पश्चात दशहरा रथ बनाने वाले दलपति तथा बेड़ा और झार उमरगांव के कारीगरों ने टुरलू ख़ोटला की पूजा अर्चना की। इस साल काष्ठ में सात लोहे की कीलें ठोंकी गई, तत्पश्चात सात मांगुर मछली, एक बकरा और लाई चना की भेंट दी गई।

संसदीय सचिव रेखचंद जैन ने कहा

दरअसल मिली जानकारी के अनुसार टुरलू ख़ोटला साल वृक्ष की एक लकड़ी होती है। इसी लकड़ी से बस्तर दशहरा हेतु रथ बनाने में प्रयुक्त जितने भी औजारों का उपयोग होता है उनका बेट यानी हत्था तैयार किया जाता है। इस मौके पर संसदीय सचिव रेखचंद जैन ने कहा कि वैश्विक महामारी कोरोना के चलते हमने गत वर्ष सादगीपूर्ण बस्तर दशहरा मनाया था। इस वर्ष भी हमें संयम में रहते हुए दशहरा महोत्सव को गरिमापूर्ण तरीके से संपन्ना कराना है। बस्तर दशहरा को निर्विघ्न संपन्ना कराने में लगभग 20 हजार लोगों की भागीदारी रहती है। बस्तर दशहरा सहकारिता का सबसे बड़ा उदाहरण और बस्तर का गौरव है। बस्तर दशहरा की दूसरी रस्म डेरी गड़ाई आगामी 19 सितंबर रविवार दोपहर 12 बजे सिरहासार भवन में पूर्ण होगी।

पाटजात्रा विधान के बाद बिरिंगपाल गांव के ग्रामीण सीरासार भवन में सरई पेड़ की टहनी को स्थापित कर डेरीगड़ाई की रस्म पूरी करेंगे। इसके बाद विशाल रथ निर्माण के लिए जंगलों से लकड़ी लाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। झारउमरगांव व बेड़ाउमरगांव के ग्रामीणों द्वारा रथ निर्माण की जिम्मेदारी निभाते हुए दस दिनों में पारंपरिक औजारों से विशाल रथ तैयार किया जाएगा।

 

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