हाइड्रोजन बम: किम की धमकी दुनिया के लिए क्यों है घातक?

वॉशिंगटन: अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच एक दूसरे को धमकियां देने का सिलसिला जारी है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप उत्तर कोरिया को नेस्तानाबूद करने की धमकी दे रहे हैं तो जवाब में किम जोंग उन ट्रंप को ‘पागल’ करार दे कर दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क का मखौल बना रहे हैं।

इस तीखी बयानबाजी के बीच जानकारों को आशंका है कि अगर उत्तर कोरिया ने वाकई वह काम कर दिया जिसकी वह लगातार धमकी दे रहा है तो पूरी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी आफत खड़ी हो जाएगी।

अगर उत्तर कोरिया प्रशांत महासागर के ऊपर हाइड्रोजन बम का परीक्षण करता है तो उसे रोकने की कोशिश भी उतनी ही घातक होगी जितना यह न्यूक्लियर टेस्ट खतरनाक होगा।

दरअसल, अभी तक उत्तर कोरिया ने अपने सभी 6 न्यूक्लियर टेस्ट अंडरग्राउंड किए हैं, जिससे चलते रेडियोऐक्टिव लीकेज कभी नहीं हुआ,

लेकिन समुद्र के ऊपर खुले आकाश में ऐसा करना बेहद घातक होगा क्योंकि ऐसे हालात में विस्फोट से बनने वाले रेडियोऐक्टिव क्लाउड को हवा अपने साथ बहाकर कहीं भी ले जा सकती है जिसका असर आसपास के देशों सहित पूरी दुनिया में हो सकता है।

हवा में न्यूक्लियर टेस्ट से जुड़े इन्हीं खतरों को देखते हुए अमेरिका और सोवियत संघ ने लगभग 50 साल पहले ही न्यूक्लियर टेस्ट प्रतिबंध समझौते में इस तरह के टेस्ट पर बैन लगा दिया था।

अब उत्तर कोरिया प्रतिबंध की धमकी दे रहे अमेरिका और जापान जैसे देशों को धमकाने के लिए इसी का इस्तेमाल कर रहा है।

हालांकि जानकार यह भी बताते हैं कि इस तरह के न्यूक्लियर टेस्ट के साथ तमाम तरह की अनिश्चितताएं जुड़ी होती हैं।

ऐसे में इसे अंजाम देने के दौरान खुद किम जोंग और उनके साथियों के लिए भी खतरा कम नहीं होगा।

खबर के मुताबिक, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रफेसर डॉ हेकर ने कहा, ‘किसी को नहीं पता कि उत्तर कोरिया के पास ऐसा टेस्ट करने की सही क्षमता है या नहीं।

हाइड्रोजन बम से लदे मिसाइल का लाइव टेस्ट बेहद जोखिम भरा होता है।’ उन्होंने बताया कि शीत युद्ध के शुरुआती दिनों में जब अमेरिका ने इस तरह के टेस्ट किए थे

तो एक बार एक मिसाइल लॉन्च पैड पर ही फट गया था और दूसरे मिसाइल को लॉन्च के तुरंत बाद तबाह करना पड़ा था जिसके चलते हवा में काफी रेडियोऐक्विट लीकेज हो गया था।

डॉ हेकर ने बताया कि इस तरह खुले आकाश में न्यूक्लियर टेस्ट पिछली बार चीन ने 16 अक्टूबर 1980 में किया था।

हालांकि वह टेस्ट सफल रहा था, लेकिन चीन इस बात को अच्छे से समझ गया था कि इसके साथ कितना बड़ा जोखिम जुड़ा हुआ है।

यही वजह है कि चीन ने दोबारा कभी इस तरह का परीक्षण नहीं किया।

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