योग से मनुष्य के जीवन में आती है सकारात्मकता- संजय अग्रवाल

चित्त की एकाग्रता को साधना है तो तो योग मार्ग पर जाना ही अति श्रेयस्कर है ।तृतीय अंन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर आयोजित परिचर्चा में वक्ताओ ने ये बाते कही.सिविल लाइन स्थित वृंदावन सभागार में 4 दिवसीय ध्यान एवं योग शिविर का आयोजन दि 20 से 23 जून तक प्रातः 6 बजे से सायं 7 बजे तक अनवरत हार्टफुलनेस, तनावमुक्ति एवं योग तथा ध्यान शिविर में प्रशिक्षण का आयोजन सफलता पूर्वक निःशुल्क किया जा रहा है ।इस दौरान अंचल के प्रमुख योगाचार्यों के मार्गनिर्देशन में अनेक प्रबुद्ध जन सैकड़ों की संख्या में इसमें भाग लेकर लाभानवित हो रहे हैं ।साथ ही *ध्यान और योग का मेरे जीवन पर पर प्रभाव* विषय पर एक सकारात्मक परिचर्चा का विशेष आयोजन भी प्रमुख विशेषज्ञों की उपस्थिति में गरिमामय ढंग से सम्पन्न हुआ । इस परिचर्चा का मुख्य उद्देश्य योग के विभिन्न विधाओं के जानने और मानने वालों को के मंच पर एकत्र कर उनके संचित ज्ञान और अनुभव के परस्पर आदान प्रदान से आबाल वृद्ध ,हर वर्ग, जाति व धर्म के समस्त नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के उसका अधिक से अधिक व्यापक लाभ निःस्वार्थ व निःशुल्क रूप से प्रदान करना है ।
इस परिचर्चा के दौरान अपने वक्तव्य और उदबोधन में छ ग राज्य योग आयोग के अध्यक्ष श्री संजय अग्रवाल ने कहा कि चित्त की एकाग्रता को साधना है तो तो योग मार्ग पर जाना ही अति श्रेयस्कर है ।कबीरपंथ के योगगुरु श्री भरतलाल मानिकपुरी ने योग की विभिन्न विधाओं और विभिन्न धर्म के अनुयायियों में परस्पर विभिन्न कर्मों के द्वारा योग को कैसे मनुष्य के जीवन में सकारात्मक प्रभाव पैदा हो,इस विषय पर चर्चा की । आर्ट ऑफ लिविंग की प्रमुख श्रीमती रचना चतुर्वेदी ने संवेदनशीलता से कहा ,कि कैसे अपने मन को नियंत्रित करना है ? कैसे जीना है ? और श्वांस के माध्यम से मानसिक और शारीरिक नियंत्रण कैसे करें ,इस विषय पर विस्तार पूर्वक अपने अनुभवों को प्रस्तुत किया । ओशो संस्थान के प्रमुख योगगुरु वरि पत्रकार संजय शर्मा ने बताया कि सच्चे अर्थों में जीने की कला *मैं मृत्यु सिखाता हूँ* से ही प्रारम्भ होता है ।उन्होंने बताया कि भले ही सबको मत मानो किन्तु सबको जानो अवश्य ही, और जीवन का भरपूर आनंद लो ,उत्सव मनाओ यही सच्चा कर्मयोग है । श्री विष्णु उपाध्याय ने कहा कि महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग के अन्तर्गत मन, शरीर और आत्मा का शुद्धिकरण करके तन मन और आत्मा के बीच संतुलन बनाने के सम्बन्ध में विचार रखे । ब्राह्मण अंन्तर्राष्ट्रीय महासंघ के अंन्तर्राष्ट्रीय परमाध्यक्ष आचार्य डॉ कीर्तिभूषण पांण्डेय ने कहा कि तीनों लोक के सबसे बड़े योग गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता में पूर्ण ध्यान ,योग और कर्म की प्रधानता को जो विभिन्न योगों के रूप में परिभाषित किया है ।यदि वर्तमान परिदृश्य में भी हम सब अक्षरशः उनका पालन कहे में तो सही मायने में मनुष्य एकाग्र होकर स्वयं का विकास, अपने परिवार का ,समाज का ,धर्म का और राष्ट्र का विकास करते हुए विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।उद्योगपति श्री दिनेश अग्गरवाल ने कहा कि प्रैकटिकल जीवन जीना ही सही मायने में योग है । योगाचार्य त्रिलोचन चावला ने कहा कि निद्रापूर्व ध्यान में अपने अनुभूतियों को अभिव्यक्त कर सकते हैं ।प्रमुख सर्जन डॉ अनूप वर्मा ने कहा कि जब आप ध्यान करते हैं तो आपके मन का नियमन होता है ,हर क्षेत्र में अच्छे निर्णय लेंगे ।अंत मे आयोजन एवं संस्था के केंद्र प्रभारी देवनारायण शर्मा ने कहा कि योग और ध्यान के बिना मनुष्य के जीवन में भौतिक सुखों का कोई अस्तित्व व कोई मूल्य नहीं । योग से ही सकल मानवता का कल्याण निहित है । उन्होंने कहा कि इससे जीवन मे सम्पूर्ण शारीरिक व मानसिक रूप से रोग मुक्त ,दोषमुक्त ,समस्यामुक्त व तनावमुक्त होकर अपने जीवन को उपलब्धियों से परिपूर्ण सफल जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करें ।

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